आगरा। ताजनगरी की जीवनदायिनी यमुना की सेहत लगातार बिगड़ रही है। शहर के नालों से निकलने वाला गंदा पानी नदी में पहुंचने से प्रदूषण का स्तर चिंताजनक स्थिति में पहुंच गया है। कैलाश घाट पर फीकल कोलीफॉर्म का स्तर 21 हजार तक पहुंचने की जानकारी सामने आई है। इससे नदी के पानी की गुणवत्ता और मानव स्वास्थ्य पर मंडराते खतरे को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
यमुना को मार्च 2028 तक प्रदूषण मुक्त बनाने का लक्ष्य निर्धारित किए जाने के बावजूद शहर के नालों से दूषित पानी का प्रवाह जारी रहने की शिकायतें सामने आ रही हैं। ऐसे में नदी को स्वच्छ बनाने की योजनाओं की प्रभावशीलता पर सवाल उठने लगे हैं।

नालों का पानी बना बड़ी चुनौती
आगरा के विभिन्न हिस्सों से निकलने वाला सीवेज, घरेलू कचरा और अन्य प्रदूषणकारी तत्व नालों के माध्यम से यमुना तक पहुंच रहे हैं। यदि इस पानी का समुचित शोधन नहीं होता है तो नदी की गुणवत्ता पर गंभीर असर पड़ना स्वाभाविक है। इससे जलीय जीवों और नदी के प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र को भी नुकसान पहुंच सकता है।
फीकल कोलीफॉर्म की अधिक मात्रा पानी में मल-मूत्र से जुड़े प्रदूषण का संकेत देती है। ऐसे पानी के संपर्क में आने से संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है। हालांकि, कैलाश घाट पर सामने आए 21 हजार के आंकड़े की सही व्याख्या के लिए जांच की तारीख, माप की इकाई और प्रयोगशाला की रिपोर्ट सार्वजनिक होना जरूरी है।
सफाई के दावों पर उठे सवाल
यमुना में रासायनिक प्रदूषण की बढ़ती समस्या भी चिंता का विषय है। केवल घाटों पर सफाई अभियान चलाने से नदी को स्वच्छ नहीं बनाया जा सकता। इसके लिए शहर के सभी प्रमुख नालों की पहचान, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की नियमित निगरानी और औद्योगिक अपशिष्ट की जांच जरूरी है।
सबसे अहम सवाल यह है कि प्रतिदिन कितना गंदा पानी यमुना में पहुंच रहा है और उसका कितना हिस्सा शोधन के बाद छोड़ा जा रहा है। जब तक नालों से आने वाले प्रदूषण पर प्रभावी रोक नहीं लगेगी, तब तक यमुना को प्रदूषण मुक्त बनाने का लक्ष्य अधूरा ही रहेगा।
ताजनगरी की ऐतिहासिक, धार्मिक और पर्यावरणीय पहचान से जुड़ी यमुना को बचाने के लिए अब योजनाओं के साथ धरातल पर ठोस कार्रवाई की दरकार है।





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