चुनावी जीत के घोड़े को जब जनता ठोकर लगाती है, तो सत्ता के रणनीतिकारों की नींद उड़ जाती है। नागपुर से वाराणसी तक विपक्ष की साइकिल ने ऐसा चक्कर चलाया कि सत्तापक्ष को अब अपने चुनावी पहियों की हवा जांचनी पड़ रही है।
लीजिए जनाब! सेंटी गुरु की मदमस्त एंट्री हो गई है। हाथ में चाय का प्याला, चेहरे पर मुस्कान और जुबान पर सियासत का तड़का। गुरु बोले- भैया, चुनाव में हार-जीत तो लगी रहती है, मगर जब जीत का घोड़ा दौड़ते-दौड़ते ठोकर खा जाए, तो सवार को अपनी सवारी पर ही शक होने लगता है।

चार राज्यों के विधान परिषद चुनावों में सत्तापक्ष को मिले झटकों ने कुछ ऐसा ही माहौल बना दिया है। खासकर नागपुर में विपक्ष की जीत ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी। अब नागपुर कोई मामूली जगह थोड़े ही है! संघ का मुख्यालय होने के कारण यहां की राजनीतिक हवा का तापमान दूर-दूर तक महसूस किया जाता है। ऐसे में विपक्ष की जीत ने सत्ता के रणनीतिकारों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दीं।
गुरु बोले- लगता है मतदाता अब चुनावी भाषणों की मिठास से नहीं, अपने अनुभवों की खटास से फैसला करने लगे हैं। प्रधानमंत्री ने विपक्ष की सीटों पर सोशल मीडिया के जरिए तंज कसा, लेकिन प्रकृति का न्याय देखिए, नागपुर ने कुछ ही समय बाद राजनीतिक व्यंग्य का विषय ही बदल दिया। पोस्ट की स्याही सूखने से पहले चुनावी नतीजों ने जवाब दे दिया।
उधर वाराणसी में साइकिलवालों की जीत ने भी सत्तापक्ष की राजनीतिक सवारी को झटका दिया। अब इसे विपक्ष की किस्मत कहें या मतदाताओं की नाराजगी, लेकिन लोकतंत्र में जनता का फैसला ही अंतिम होता है। जनता जब चाहती है, तो साइकिल को भी रफ्तार दे देती है और सत्ता के घोड़े को भी ब्रेक लगा देती है।
वैसे हार के बाद आत्ममंथन का खेल भी बड़ा निराला है। बैठकें होंगी, रिपोर्ट बनेगी, जिम्मेदारियां तय होंगी और फिर अगले चुनाव में वही पुराने चेहरे, वही पुराने वादे और वही पुराने भाषण मैदान में उतर आएंगे। यानी आत्ममंथन की थाली में पकवान नए, मगर मसाले पुराने!
गुरु की सलाह है सत्ता का तकिया कितना भी मुलायम हो, जनता की करवट उसे बेचैन कर ही देती है। इसलिए सोशल मीडिया पर तंज कसने से पहले जनता का मिजाज पढ़िए, वरना ईवीएम से पहले मतदाता ही राजनीतिक नींद का अलार्म बजा देंगे!
- संजय एम तराणेकर





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