30 अक्टूबर, 2026  |  22:35 IST
Jila Nazar
शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026
विज्ञापन
Billboard 1275x450

बैलेट पेपर भी नहीं जिता पाए, अब किस पर ठीकरा फूटेगा?

सेंटी गुरु का तंजनामा... ✍️

⏱ 1 मिनट में पढ़ें👁 14 बार पढ़ा गया
बैलेट पेपर भी नहीं जिता पाए, अब किस पर ठीकरा फूटेगा?

अरे भइया! सेंटी गुरु की एंट्री हो गई है। जरा कुर्सी की पेटी बांध लीजिए, क्योंकि आज सियासत की उस दुकान का हिसाब-किताब होगा, जहां जीत का श्रेय लेने के लिए नेताओं की लाइन लग जाती है, मगर हार होते ही जिम्मेदारी का काउंटर बंद हो जाता है! कोई ईवीएम को दोष देता है, कोई चुनाव आयोग को कटघरे में खड़ा करता है, तो कोई मतदाता सूची में लोकतंत्र का लापता पता खोजने लगता है। लेकिन जब बैलेट पेपर भी उम्मीदों की नैया पार न लगा पाए, तब गुरु पूछते हैं, हुजूर, अब मशीन बदलिएगा या अपनी राजनीति की मरम्मत भी करवाइएगा?

सियासत का भी गजब गणित है! जीत मिले तो जनता समझदार, नेतृत्व दमदार और रणनीति शानदार। हार मिल जाए तो मशीन बेईमान, व्यवस्था परेशान और नतीजे संदेहास्पद! वाह रे राजनीति के गणितज्ञों! जनता का फैसला पसंद आए तो लोकतंत्र की जय-जयकार, मनमाफिक न हो तो लोकतंत्र की परीक्षा शुरू!

विज्ञापन
WhatsApp

राहुल बाबा हों या दूसरे विपक्षी सूरमा, सवाल पूछना उनका अधिकार है। चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी के प्रमाण हों तो जांच भी होनी चाहिए। मगर गुरु की छोटी-सी जिज्ञासा है अगर बैलेट पेपर ही जीत की गारंटी है, तो फिर वहां भी चुनावी नैया क्यों डगमगाने लगती है? कहीं ऐसा तो नहीं कि मशीन बदलने की मांग के शोर में संगठन की मरम्मत का काम पीछे छूट गया?

उधर बंगाल और बिहार की सियासत हो या केरल की राजनीतिक करवटें, हर जगह जनता अपने हिसाब से फैसला सुनाती है। गठबंधन बनते हैं, समीकरण सजते हैं, मंचों से क्रांति के बिगुल बजते हैं; लेकिन मतदाता जब अपनी उंगली का इस्तेमाल करता है, तो बड़े-बड़े राजनीतिक गणित धरे रह जाते हैं। समाजवादी हों, कांग्रेसी हों या बहुजन राजनीति के धुरंधर सबको समझना होगा कि जनता केवल भाषण नहीं, परिणाम भी मांगती है।

महंगाई से राहत, युवाओं को रोजगार, बेहतर शिक्षा, सम्मान और विकास ये जनता के असली मुद्दे हैं। मतदाता को इन सवालों के जवाब चाहिए, न कि हार के बाद बहानों की नई किस्त!

**सेंटी गुरु बोले - हुजूर, बैलेट हो या ईवीएम, जनता का मिजाज पढ़ना सीखिए। मशीन पर उंगली उठाने से पहले अपने संगठन की नब्ज तो टटोलिए! लोकतंत्र में मतदाता को गलत साबित करने से कोई नेता बड़ा नहीं बनता। बड़ा वही बनता है, जो जनता के फैसले से सीखकर अपनी कमियां सुधारता है।

क्योंकि जनाब, चुनाव मशीन नहीं हराती, जनता का भरोसा खोना हराता है; और खोया हुआ भरोसा नारों से नहीं, काम से लौटता है!

सेंटी गुरु

यह खबर शेयर करें
jilanazar.com
jilanazar.com · सम्पादकीय डेस्क jilanazar.com की और खबरें →

यह भी पढ़ें

टिप्पणियाँ

इस खबर पर सबसे पहले अपनी टिप्पणी करें।