27 अक्टूबर, 2026  |  02:06 IST
Jila Nazar
मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026
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नेताओं की जुबान में लगी चुनावी मिर्च, मुद्दे हुए गायब!

सेंटी गुरु का तंजनामा... ✍️

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नेताओं की जुबान में लगी चुनावी मिर्च, मुद्दे हुए गायब!

अरे भइया! सेंटी गुरु आ गए हैं अपनी कलम में व्यंग्य की स्याही और जुबान पर मर्यादा का सवाल लेकर! राजनीति के अखाड़े में इन दिनों विकास, रोजगार, महंगाई और मतदाता सूची जैसे मुद्दे बेचारे कोने में खड़े अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं, जबकि नेताओं की जुबान एक-दूसरे पर शब्दों के बम बरसाने में व्यस्त है। लगता है चुनावी राजनीति में अब भाषण नहीं, बदजुबानी का ओलंपिक चल रहा है!

हाल ही में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के एक बयान ने सियासी गलियारों में हलचल मचा दी। बिहार के पटना में एसआईआर को लेकर सवाल उठाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संदर्भ में उनकी टिप्पणी विवाद का विषय बन गई। बस फिर क्या था! मतदाता सूची की पारदर्शिता पर होने वाली बहस पीछे छूट गई और राजनीतिक दल भाषा की मर्यादा का पोस्टमार्टम करने बैठ गए।

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सेंटी गुरु बोले अरे नेताजी! सवाल तो मतदाता सूची का था, फिर बात परिवार तक कैसे पहुंच गई? जनता पूछ रही है कि वोटर लिस्ट में गड़बड़ी है या नहीं, और नेता जी जवाब में शब्दों की ऐसी आतिशबाजी कर रहे हैं कि असली मुद्दा धुएं में गायब हो गया!

वैसे यह बीमारी किसी एक दल की बपौती नहीं है। कभी कोई विरोधी को सांप बता देता है, कभी रावण से तुलना कर देता है, तो कभी आतंकवादी जैसे शब्द राजनीतिक शब्दकोश में उछाल दिए जाते हैं। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, माइक हाथ में आते ही कुछ नेताओं की जुबान को मानो ब्रेक लगाना याद ही नहीं रहता। फिर बयान पर बवाल, प्रवक्ताओं की प्रेस कॉन्फ्रेंस और टीवी चैनलों पर घंटों की बहस!

सेंटी गुरु ने माथा खुजाते हुए कहा भाइयो, नेताओं की जुबान भी कमाल की मशीन है। चलती है तो मुद्दे पैदा करने के बजाय विवाद पैदा करती है। जनता महंगाई का हिसाब मांगती है, जवाब में गाली-गलौज की किश्त मिलती है। बेरोजगार नौकरी पूछता है, उसे राजनीतिक दुश्मनी का नया अध्याय सुनने को मिलता है।

और सबसे मजेदार बात तो यह है कि हर दल अपने नेता की फिसली जुबान को भावनाओं का मामला बताता है, लेकिन विरोधी की टिप्पणी को लोकतंत्र पर हमला घोषित कर देता है। यानी अपनी गलती जुबान की फिसलन और दूसरे की गलती चरित्र का प्रमाण!

सेंटी गुरु की आखिरी सलाह है नेताजी, जनता को तालियां बजाने वाली भीड़ मत समझिए। लोकतंत्र में तीखा विरोध जरूरी है, लेकिन व्यक्तिगत अपमान जरूरी नहीं। एसआईआर पर सवाल हैं तो जवाब दीजिए, गड़बड़ी है तो सबूत रखिए और गलती है तो सुधार कराइए।

याद रखिए, चुनाव में जुबान से तालियां मिल सकती हैं, लेकिन जनता का भरोसा काम, तर्क और मर्यादा से ही मिलता है। वरना भाषण खत्म होने के बाद नेता मंच से उतर जाएगा और उसकी फिसली जुबान का हिसाब जनता अपनी याददाश्त में दर्ज रखेगी!

— सेंटी गुरु

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