27 अक्टूबर, 2026  |  02:51 IST
Jila Nazar
मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026
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शादी से पहले राजा बनने के सपने, शादी के बाद हाथ में पंखा!

- अजय कुमार बियानी... ✍️

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शादी से पहले राजा बनने के सपने, शादी के बाद हाथ में पंखा!

कुंवारेपन के दिनों में अपने विवाहित मित्रों को देखकर मुझे उनसे बड़ी ईर्ष्या होती थी। ईर्ष्या उनकी नौकरी, वेतन या संपत्ति से नहीं, बल्कि पत्नियों के प्रेम और सेवाभाव से होती थी। मित्र जैसे ही घर लौटते, पत्नियां उनके जूते उतारतीं, पानी लाकर पैर धुलातीं और फिर उन्हें आराम से बैठाकर पंखा झलने लगतीं। यह दृश्य देखकर मुझे लगता था कि धरती पर स्वर्ग कहीं है, तो इन्हीं घरों में है।

मैं भी मन ही मन अपनी भावी पत्नी की कल्पना करता और सोचता कि जब मेरे मित्रों को इतनी सेवाभावी पत्नियां मिली हैं, तो मुझे क्यों नहीं मिलेंगी? आखिरकार मेरी शादी का दिन भी आ गया। घोड़ी पर बैठते समय मन में राजा बनने का खुमार था। मुझे क्या पता था कि घोड़ी की सवारी कुछ घंटों की है, जबकि गृहस्थी की असली सवारी शादी के बाद शुरू होगी!

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शादी हुई, दुल्हन घर आई और मेरे अरमान फिर अंगड़ाइयां लेने लगे। मुझे उस शुभ घड़ी का इंतजार था, जब घर लौटने पर पत्नी मेरे जूते उतारेगी और प्रेम से पंखा झलेगी। लेकिन समस्या यह थी कि मेरे पास जूतों की केवल एक जोड़ी थी, वह भी साले साहब की दी हुई। फिर भी मैंने सपनों को हकीकत में बदलने की ठान ली।

एक दिन जूते पहनकर बाहर गया और लौटकर पत्नी के सामने बैठ गया। जूते की ओर इशारा किया, फिर दोबारा किया। पत्नी ने मेरी मंशा समझने के बजाय कहा, “मुझे जूता दिखाकर डराने की कोशिश मत करना। तुम्हारे पास एक जोड़ी जूते हैं, वह भी मेरे भाई के दिए हुए। मैं मायके से छह जोड़ी जूतियां लाई हूं। समझ गए न?”

मेरे प्रेमपूर्ण अरमान जूतों की गिनती में ही दम तोड़ गए। तभी पत्नी का अगला फरमान आया, “घर में पंखा तो है नहीं, जरा मुझे पंखा झल दो। फिर खाने में सब्जियां, फ्राई दाल और जीरा राइस बना देना।”

मैंने मित्रों के घरों के उन सुखद दृश्यों को याद किया और चुपचाप पंखा झलने लगा। उस दिन समझ आया कि दूसरों के घरों का एक दृश्य देखकर पूरी जिंदगी का निष्कर्ष निकाल लेना कितनी बड़ी भूल है।

दरअसल, मैंने विवाह को साझेदारी नहीं, अपनी सुख-सुविधाओं का स्थायी प्रबंध समझ लिया था। मैं चाहता था कि पत्नी मेरी सेवा करे, लेकिन यह भूल गया कि रिश्ते अपेक्षाओं से नहीं, आपसी सम्मान, प्रेम और सहयोग से चलते हैं।

आज उस घटना को याद करके हंसी आती है। बारात में घोड़ी पर बैठकर खुद को राजा समझ रहा था, लेकिन घर पहुंचते ही हाथ में पंखा आ गया। सच यही है कि विवाह में न पति जन्मजात राजा होता है, न पत्नी सेविका। दोनों मिलकर ही गृहस्थी को स्वर्ग बनाते हैं। शादी से पहले मैं राजा बनने के सपने देख रहा था, मगर शादी के बाद पता चला कि मैं अपनी ही गलतफहमियों का गधा था!

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