धर्म की दुनिया भी बड़ी निराली है। यहां कोई मंदिर में माथा टेककर सुकून खोजता है, कोई जरूरतमंद की मदद करके आत्मसंतोष पाता है, तो कोई दान की रसीद हाथ में लेकर पुण्य की गारंटी ढूंढता है। मानो भगवान भी कोई सरकारी दफ्तर चला रहे हों, जहां दान जमा करो, रसीद कटवाओ और बदले में स्वर्ग की पक्की रसीद घर ले जाओ!
समाज में ऐसे लोगों की कमी नहीं, जो समाजसेवा का बिल्ला लगाकर घूमते हैं। दान देते समय उनकी नजर जरूरतमंद की जरूरत पर कम और कैमरे के एंगल पर ज्यादा रहती है। चेक भले ही छोटा हो, लेकिन तस्वीर ऐसी चाहिए कि समाजसेवा का इतिहास लिख दिया जाए। अखबार में नाम छपे, मंच पर सम्मान मिले और सोशल मीडिया पर वाहवाही बरसे, तभी उनके दान की आत्मा को शांति मिलती है।

दान करना अच्छी बात है
लेकिन दान के बदले प्रतिष्ठा, प्रशंसा और पुण्य का हिसाब मांगना कैसी उदारता है? अगर किसी भूखे को भोजन कराकर उसकी तस्वीर दस जगह चिपकानी पड़े, किसी गरीब की मदद के बाद उसे एहसान के बोझ तले दबाना पड़े, तो यह सेवा कम और अहंकार का विज्ञापन ज्यादा है।
धर्म का मूल भाव त्याग, करुणा और मानवता है। लेकिन जब धार्मिकता का प्रमाण बैंक की पर्ची, दान की रसीद और सम्मान-पत्र बनने लगें, तो आत्ममंथन जरूरी हो जाता है। ईश्वर के सामने इंसान की नीयत का क्या मूल्य है, यह किसी रसीद पर नहीं लिखा होता।
विडंबना देखिए, कुछ लोग दान की मोटी रकम देकर अपने सारे कर्मों का हिसाब बराबर मान लेते हैं। मानो गलत व्यवहार, शोषण और बेईमानी के खाते में दान जमा करके सब कुछ माफ कराया जा सकता हो!
अगर दान का उद्देश्य केवल पुण्य कमाना है, तो फिर वह सेवा नहीं, आध्यात्मिक निवेश हुआ। और अगर उद्देश्य समाज का भला करना है, तो रसीद से ज्यादा जरूरी उस चेहरे की मुस्कान है, जिसकी परेशानी आपने कम की।
याद रखिए, दान की रकम बड़ी होने से इंसान बड़ा नहीं होता, उसकी नीयत बड़ी होने से होता है। सच्ची समाजसेवा वह है, जिसका शोर कम और असर ज्यादा हो।
दान जरूर कीजिए, लेकिन पुण्य की गारंटी मत मांगिए। क्योंकि इंसान रसीद संभाल सकता है, अपनी नीयत का सच नहीं छिपा सकता।





टिप्पणियाँ
इस खबर पर सबसे पहले अपनी टिप्पणी करें।