भारत का लोकतंत्र अपने सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ
निष्पक्ष चुनाव की परीक्षा दे रहा है। चुनाव आयोग द्वारा विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के तहत लगभग 13 करोड़ नामों को मतदाता सूची से हटाने के फैसले ने देशभर में तीखी बहस छेड़ दी है। विपक्ष इसे “वोट चोरी” बता रहा है, जबकि सत्ता पक्ष इसे घुसपैठियों और डुप्लिकेट प्रविष्टियों की सफाई बताता है। दोनों पक्षों के तर्कों के बीच आम नागरिक का विश्वास ही सबसे बड़ा दांव पर है।

युवा प्रदर्शनकारियों, विशेषकर “कॉकरोच जनता पार्टी” जैसे समूहों ने दिल्ली की सड़कों पर उतरकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की है। हजारों लोगों की हिरासत, इंटरनेट प्रतिबंध और भारी पुलिस बंदोबस्त ने इस मुद्दे को और संवेदनशील बना दिया है। राहुल गांधी समेत विपक्षी नेताओं का आरोप है कि यह प्रक्रिया चुनावी मैदान को एकतरफा बनाने की कोशिश है। वहीं सरकार और भाजपा का कहना है कि स्वच्छ मतदाता सूची लोकतंत्र की मजबूती के लिए जरूरी है और विदेशी ताकतों द्वारा अस्थिरता फैलाने की कोशिश हो रही है।
सच्चाई यह है कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और पारदर्शिता पर सवाल उठना किसी भी लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है। यदि नाम हटाने की प्रक्रिया में गलतियां हुई हैं, तो उन्हें सुधारा जाना चाहिए। यदि घुसपैठ और फर्जी मतदाताओं की समस्या वास्तविक है, तो उसे भी निष्पक्ष तरीके से निपटाया जाना चाहिए। दोनों ही स्थितियों में समाधान संवाद और संस्थागत सुधारों में है, न कि आरोप-प्रत्यारोप और सड़क संघर्ष में।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने स्पष्ट किया है कि महाभियोग प्रस्ताव आने पर नियमों के अनुसार जांच होगी। यह सकारात्मक संकेत है। अब जरूरत है कि चुनाव आयोग खुद अपनी प्रक्रिया को और पारदर्शी बनाए, प्रभावित मतदाताओं के लिए त्वरित शिकायत निवारण तंत्र मजबूत करे और राजनीतिक दलों को विश्वास में ले।
भारत की ताकत उसकी लोकतांत्रिक परंपरा में है। मतदाता सूची का विवाद इस परंपरा की परीक्षा है। इसे राजनीतिक स्कोरिंग का मुद्दा बनाने के बजाय संस्थागत मजबूती का अवसर बनाना चाहिए। तभी लोकतंत्र की नींव और मजबूत होगी।
सन्त कुमार भारद्वाज





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