विजयादशमी पर रावण का पुतला जलाकर हम प्रतिवर्ष बुराई पर अच्छाई की विजय का उत्सव मनाते हैं। आतिशबाजी होती है, जयघोष गूंजते हैं और सत्य की विजय का संदेश दिया जाता है। लेकिन उत्सव समाप्त होते ही एक असहज प्रश्न सामने खड़ा हो जाता है क्या रावण के पुतले के साथ समाज में व्याप्त अहंकार, अन्याय, भ्रष्टाचार और सत्ता का दुरुपयोग भी जल पाया?
रावण केवल रामायण का एक पात्र नहीं, बल्कि अहंकार और अनैतिक आचरण के दुष्परिणामों का प्रतीक भी है। उसका अंत इस बात का संदेश देता है कि ज्ञान, शक्ति और वैभव भी मर्यादा तथा नैतिकता के अभाव में विनाश को नहीं रोक सकते। यही संदेश आज की राजनीति के लिए भी प्रासंगिक है।

लोकतंत्र में सत्ता जनता की अमानत है, व्यक्तिगत प्रभुत्व का साधन नहीं। जनप्रतिनिधियों से अपेक्षा होती है कि वे जनहित को प्राथमिकता दें, वादों के प्रति जवाबदेह रहें और आलोचना को लोकतांत्रिक व्यवस्था का स्वाभाविक अंग मानें। किंतु जब राजनीतिक विमर्श जनसमस्याओं के बजाय आरोप-प्रत्यारोप, व्यक्तिगत महिमामंडन और विरोधियों को नीचा दिखाने तक सीमित होने लगे, तब आत्ममंथन आवश्यक हो जाता है।
यह भी सच है कि भ्रष्टाचार, सामाजिक भेदभाव, महिला असुरक्षा और प्रशासनिक उदासीनता जैसी चुनौतियां केवल भाषणों से समाप्त नहीं होंगी। इनके लिए पारदर्शी व्यवस्था, निष्पक्ष कार्रवाई, मजबूत संस्थाएं और नागरिकों की सक्रिय भागीदारी जरूरी है। मतदाता की जिम्मेदारी भी केवल मतदान तक सीमित नहीं, उसे जनप्रतिनिधियों के कामकाज का मूल्यांकन करना चाहिए।
वास्तविक विजयादशमी तभी सार्थक होगी, जब रावण का दहन मैदानों से निकलकर हमारे आचरण और व्यवस्था तक पहुंचे। पुतले हर साल जलते रहेंगे, लेकिन समाज तभी बदलेगा, जब अन्याय के सामने मौन रहने की प्रवृत्ति जलेगी, सत्ता का अहंकार टूटेगा और राजनीति में नैतिकता का पुनर्स्थापन होगा।
आखिर प्रश्न यही है रावण तो जला दिया, लेकिन अपने भीतर और व्यवस्था में छिपे रावण को जलाने का संकल्प कब लेंगे?
सन्त कुमार भारद्वाज





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