किसी भी जघन्य अपराध का अंत अदालत के फैसले से हो सकता है, लेकिन उससे उपजे घाव समाज की चेतना में लंबे समय तक बने रहते हैं। सौरभ हत्याकांड में मुस्कान और साहिल को फांसी की सजा सुनाए जाने की खबर ने एक बार फिर न्याय, अपराधबोध, पारिवारिक जिम्मेदारी और मासूम बच्चों के भविष्य जैसे गंभीर सवालों को सामने ला दिया है। सजा सुनाए जाने से पहले दोनों ने अदालत से कम सजा देने की अपील की। मुस्कान ने अपनी दो छोटी बेटियों का हवाला देते हुए उनके भविष्य की चिंता जताई। यह दृश्य संवेदनशील मन को विचलित कर सकता है, लेकिन इस भावुक क्षण के साथ अपराध की गंभीरता और पीड़ित पक्ष के दर्द को भी याद रखना जरूरी है।
मुस्कान की बेटियां उस अपराध के लिए जिम्मेदार नहीं हैं, जिसका फैसला अदालत ने सुनाया है। उनका बचपन, सुरक्षा, शिक्षा और भावनात्मक विकास किसी भी परिस्थिति में उपेक्षित नहीं होने चाहिए। बच्चों को अपने माता-पिता के कृत्यों का सामाजिक दंड देना न्याय नहीं है। उन्हें संरक्षण, सम्मान और सामान्य जीवन जीने का अवसर मिलना चाहिए।
लेकिन संवेदना का अर्थ अपराध की गंभीरता को कम करके आंकना भी नहीं है। सौरभ के परिवार की पीड़ा, उनके खोए हुए अपने की कमी और न्याय की अपेक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। एक संवेदनशील समाज वही है, जो पीड़ित परिवार के दर्द को समझते हुए निर्दोष बच्चों के प्रति भी करुणा बनाए रखे।
अदालत का काम भावनाओं के दबाव में नहीं, साक्ष्यों और कानून के आधार पर न्याय करना है। मृत्युदंड जैसे गंभीर फैसले में कानूनी प्रक्रिया और अपील के अधिकारों का महत्व भी समझना चाहिए। किसी फैसले पर प्रतिक्रिया देते समय हमें न तो अपराध को सनसनी में बदलना चाहिए और न ही पीड़ित परिवार के दर्द को भुलाना चाहिए।
इस घटना से समाज को भी आत्ममंथन करना चाहिए। रिश्तों में विश्वास, संवाद और जिम्मेदारी का स्थान जब स्वार्थ और हिंसा ले लेते हैं, तो उसका परिणाम केवल एक व्यक्ति की जिंदगी तक सीमित नहीं रहता। पूरा परिवार और आने वाली पीढ़ियां प्रभावित होती हैं।
सबसे बड़ा सबक यही है कि न्याय और करुणा एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। सौरभ को खोने वाले परिवार को न्याय मिले, दोषियों के मामले में कानून अपना काम करे और उनकी बेटियों को सुरक्षित भविष्य तीनों बातें एक साथ महत्वपूर्ण हैं। उन बच्चियों को यह अधिकार मिलना चाहिए कि वे भय, उपेक्षा और सामाजिक तिरस्कार के बिना अपना जीवन बना सकें।
समाज की परिपक्वता इसी में है कि वह अपराध के प्रति कठोरता रखे, पीड़ित के प्रति संवेदना दिखाए और निर्दोष बच्चों के प्रति अपनी मानवीय जिम्मेदारी कभी न भूले।
सन्त कुमार भारद्वाज





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