जो लोग संविधान की किताब हाथ में लेकर सड़कों पर घूमते हैं, उन्हें कभी-कभी स्वयं संविधान की मूल भावना की जानकारी नहीं होती। हालिया चर्चा में बार-बार यह कहा जा रहा है कि सरकार कुछ संवैधानिक पदों को मनमाने ढंग से हटा सकती है। वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है।
भारतीय संविधान ने तीन महत्वपूर्ण पदों को विशेष सुरक्षा दी है सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश (जिसमें मुख्य न्यायाधीश भी शामिल हैं), नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) और मुख्य चुनाव आयुक्त। अनुच्छेद 124(4) के अनुसार किसी भी सुप्रीम कोर्ट जज को केवल सिद्ध कदाचार या अक्षमता के आधार पर ही हटाया जा सकता है। इसके लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत कुल सदस्यता का बहुमत और उपस्थित सदस्यों का दो-तिहाई
आवश्यक है। राष्ट्रपति का आदेश तभी जारी होता है जब यह प्रक्रिया पूरी हो।
अनुच्छेद 148(1) सीएजी को ठीक वही सुरक्षा प्रदान करता है। अनुच्छेद 324(5) मुख्य चुनाव आयुक्त को भी सुप्रीम कोर्ट जज के समान हटाने की प्रक्रिया से जोड़ता है। अन्य चुनाव आयुक्तों के मामले में थोड़ी भिन्नता है उन्हें मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश पर ही हटाया जा सकता है। लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त की स्थिति अत्यंत सुरक्षित है।
इसके विपरीत मंत्रियों का पद प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत है। उन्हें आसानी से हटाया जा सकता है। संविधान निर्माताओं ने इन तीन पदों को जानबूझकर कार्यपालिका के प्रत्यक्ष नियंत्रण से बाहर रखा। न्यायपालिका, वित्तीय निगरानी और चुनाव की निष्पक्षता ये लोकतंत्र के स्तंभ हैं। यदि इन्हें सरकार के इशारे पर हटाया जा सके तो संस्थागत स्वतंत्रता समाप्त हो जाएगी।
आज जरूरत है कि संविधान को केवल प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि उसकी आत्मा के साथ समझा जाए। ये सुरक्षा प्रावधान कोई आड़ नहीं, बल्कि लोकतंत्र की मजबूत दीवार हैं। जो लोग इन्हें नजरअंदाज कर ड्रामा रचते हैं, वे वास्तव में संविधान की मूल भावना को ही कमजोर कर रहे हैं। संविधान पढ़ना और समझना दोनों जरूरी हैं।
सन्त कुमार भारद्वाज





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