20 अक्टूबर, 2026  |  01:00 IST
Jila Nazar
मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026
विज्ञापन
Billboard 1275x450

आस्था का हुजूम, सुरक्षा क्यों गुम?

संपादकीय | सन्त कुमार भारद्वाज... ✍️

⏱ 1 मिनट में पढ़ें👁 6 बार पढ़ा गया
आस्था का हुजूम, सुरक्षा क्यों गुम?

त्योहार खुशियां बांटने के लिए होते हैं, मातम मनाने के लिए नहीं। लेकिन जब आस्था के उत्सव में भगदड़ मचती है और लोग अपनी जान गंवा देते हैं, तब सवाल केवल हादसे का नहीं, बल्कि हमारी व्यवस्था की प्राथमिकताओं का भी होता है। कोलकाता के चोरबागान सरबजानिन दुर्गा पूजा पंडाल में भगदड़ की घटना ने एक बार फिर बड़े आयोजनों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। हालांकि, मृतकों और घायलों की संख्या की आधिकारिक पुष्टि के आधार पर ही अंतिम निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए।

भारत में धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन सामाजिक एकता के प्रतीक हैं। दुर्गा पूजा से लेकर कुंभ मेले तक करोड़ों लोग श्रद्धा और उत्साह के साथ जुटते हैं। लेकिन भीड़ जितनी विशाल होती है, सुरक्षा की जिम्मेदारी भी उतनी ही बढ़ जाती है। दुर्भाग्य यह है कि कई बार भव्य सजावट, प्रचार और वीआईपी व्यवस्थाओं के बीच आम श्रद्धालुओं की सुरक्षा पीछे छूट जाती है।

विज्ञापन
WhatsApp

क्षमता से अधिक प्रवेश, संकरे रास्ते, आपातकालीन निकास की कमी और चिकित्सा सुविधाओं का अभाव जानलेवा साबित हो सकते हैं। अचानक होने वाली घोषणाएं, बारिश और भीड़ का अनियंत्रित दबाव स्थिति को और गंभीर बना देते हैं। ऐसे आयोजनों में सुरक्षा कोई औपचारिकता नहीं, बल्कि अनिवार्य जिम्मेदारी है।

जिम्मेदारी केवल प्रशासन की नहीं, आयोजन समितियों और स्थानीय निकायों की भी है। भीड़ की अधिकतम सीमा तय करना, प्रवेश और निकास के अलग रास्ते बनाना, प्रशिक्षित स्वयंसेवकों की तैनाती, एंबुलेंस की उपलब्धता और आपातकालीन अभ्यास सुनिश्चित करना जरूरी है। सीसीटीवी, भीड़ निगरानी और समयबद्ध चेतावनी प्रणाली भी प्रभावी ढंग से लागू की जानी चाहिए।

सरकारों को बड़े आयोजनों के लिए एक समान न्यूनतम सुरक्षा मानक और स्पष्ट जवाबदेही तय करनी चाहिए। लापरवाही सामने आने पर निष्पक्ष जांच और नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। नागरिकों को भी धैर्य और अनुशासन बनाए रखना होगा।

आस्था तभी सुरक्षित है, जब आस्थावान सुरक्षित हैं। हर हादसे के बाद संवेदना जताना पर्याप्त नहीं। श्रद्धालुओं की जान बचाने के लिए पहले से तैयारी करना ही सच्ची जिम्मेदारी है। आखिर त्योहार की सफलता पंडाल की ऊंचाई या सजावट से नहीं, बल्कि इस बात से तय होनी चाहिए कि हर व्यक्ति सुरक्षित घर लौटे।

सन्त कुमार भारद्वाज

यह खबर शेयर करें
jilanazar.com
jilanazar.com · सम्पादकीय डेस्क jilanazar.com की और खबरें →

यह भी पढ़ें

टिप्पणियाँ

इस खबर पर सबसे पहले अपनी टिप्पणी करें।