दशहरा आया, मैदान सजा, धनुष तना और बेचारा रावण फिर से समय पर ड्यूटी पर पहुंच गया। हर साल वही किस्मत ऊंचाई बढ़ती जाती है, आतिशबाजी महंगी होती जाती है और अंत में पांच मिनट में राख! सेंटी गुरु सोच रहे हैं कि अगर असली रावण की आत्मा कहीं बैठकर यह नजारा देख रही होगी, तो जरूर कहती होगी “भाइयों, मुझे हर साल जलाकर इत्मीनान कर लेते हो, लेकिन मेरी पूरी कंपनी तो अब तुम्हारे बीच प्रमोशन लेकर घूम रही है!”
तब का रावण दस सिर वाला था, इसलिए पहचानना आसान था। आज का रावण बड़ा चालाक है एक सिर मोबाइल की स्क्रीन में, दूसरा फेक न्यूज़ में, तीसरा रिश्वत की फाइल में, चौथा ट्रोल की प्रोफाइल में और पांचवां अहंकार के सेल्फी कैमरे में। बाकी पांच सिर तो ऐसे हैं कि मौका मिलते ही चेहरे बदल लेते हैं।

तब रावण सोने की लंका में रहता था, आज का रावण वातानुकूलित दफ्तरों, चमचमाती गाड़ियों और सोशल मीडिया के फिल्टरों में रहता है। तब उसने सीता का हरण किया था, आज का रावण कभी भरोसा चुराता है, कभी ईमानदारी और कभी इंसानियत। फर्क बस इतना है कि तब राम धनुष लेकर निकले थे, आज लोग मोबाइल निकालकर वीडियो बनाने लगते हैं।
सेंटी गुरु को सबसे ज्यादा हैरानी उस बेचारे पुतले पर आती है, जिसे हर साल जलने का ठेका मिला है। असली रावण तो सामने खड़े होकर सेल्फी लेता है, ताली बजाता है और घर जाकर अगले साल का बड़ा पुतला बनाने की मीटिंग भी तय कर देता है।
रामलीला के मंच पर राम जीत जाते हैं, लेकिन असली परीक्षा मंच से उतरने के बाद शुरू होती है। ट्रैफिक में धैर्य, दफ्तर में ईमानदारी, घर में सम्मान और समाज में न्याय
यहीं तय होता है कि हमारे भीतर राम जागे हैं या रावण अभी भी वीआईपी पास लेकर बैठा है।
इस बार पुतला जरूर जलाइए, पर उससे पहले अपने भीतर बैठे उस छोटे से रावण को पहचान लीजिए, जो हर गलती पर कहता है “मैं सही हूं।”
वरना अगले साल फिर वही होगा रावण जलेगा, आतिशबाजी होगी और असली रावण दर्शक दीर्घा में बैठकर सबसे जोर से ताली बजाएगा।
• सेंटी गुरु





टिप्पणियाँ
इस खबर पर सबसे पहले अपनी टिप्पणी करें।