अरे ओ हुक्मरानो! जरा कान खोलकर सुन लो! सेंटी गुरु आ गया है अपनी कलम की धार लेकर। आज मामला बड़ा संगीन है। एक मास्टर साहब विद्यालय समय में पानी पीते पकड़े गए हैं! विभागीय मर्यादाएँ खतरे में हैं, अनुशासन वेंटिलेटर पर है और शिक्षा व्यवस्था की चूलें हिल गई हैं!
सूत्रों की मानें तो गुरुजी ने पानी पीने से पहले सक्षम अधिकारी से अनुमति नहीं ली। अब बताइए, प्यास गुरुजी को लगी थी, लेकिन जवाबदेही पूरे विभाग की बन गई! कहीं पानी का घूँट सरकारी खजाने से तो नहीं गया?
सेंटी गुरु को आशंका है कि विभाग जल्द ही ऐतिहासिक आदेश जारी करेगा
प्यास लगने से पहले आवेदन अनिवार्य! पानी पीने के बाद संतुष्टि प्रमाणपत्र जरूरी! छींकने पर कारण बताओ नोटिस! जम्हाई लेने पर कार्य के प्रति उदासीनता का आरोप! और गलती से पाँच मिनट बैठ गए तो बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ की उच्चस्तरीय जाँच!
वाह री व्यवस्था! शिक्षक पढ़ाने आया है या हर साँस का हिसाब देने?
कभी रजिस्टर, कभी पोर्टल, कभी ऐप, कभी वीडियो, कभी वेबिनार, कभी निरीक्षण और कभी स्पष्टीकरण! गुरुजी बच्चों को पढ़ाएँ या अपनी नौकरी बचाने के लिए रोज अपनी बेगुनाही के सबूत जुटाएँ?
सेंटी गुरु पूछते है जब शिक्षक का आधा समय कागजी घोड़े दौड़ाने में और बाकी आधा अधिकारियों को संतुष्ट करने में बीतेगा, तो कक्षा में ज्ञान की गंगा कौन बहाएगा? बच्चे पढ़ेंगे कैसे, जब गुरुजी खुद आदेशों की बाढ़ में डूबे होंगे?
अनुशासन जरूरी है, जवाबदेही भी जरूरी है। लेकिन सामान्य मानवीय जरूरतों को अपराध बना देना कौन-सी प्रशासनिक दूरदर्शिता है? शिक्षक इंसान है, सरकारी मशीन नहीं कि बटन दबाया और चौबीस घंटे उत्पादन शुरू!
सेंटी गुरु का अंतिम प्रहार!
कल की ब्रेकिंग न्यूज़ तैयार रखिए “विद्यालय समय में साँस लेते पकड़े गए शिक्षक! ऑक्सीजन की खपत पर विभाग सख्त, जाँच के आदेश!”
और याद रखिए जिस व्यवस्था में पानी पीने पर पहरा और पढ़ाने पर पहाड़ हो, वहाँ बच्चों का भविष्य नहीं, फाइलों का वजन बढ़ता है!
- सेंटी गुरु



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