वाह रे वक्त के जादूगर! पटरी वही, ट्रेन वही, बस रोकने वालों की भूमिका बदल गई… इसे कहते हैं असली जादू-मंतर!
अरे ओ भैया! जरा इधर तो आना… कान खोलकर सुनना और दिमाग की खिड़की जरा खुली रखना! तुम्हारा अपना सेंटी गुरु आ गया है, हाथ में व्यंग्य की तलवार, जुबान पर तंज की मिठास और चेहरे पर ऐसा मुस्कुराता सवाल, जिसका जवाब बड़े-बड़े सूरमा भी ढूंढ़ते रह जाएं!
सेंटी गुरु ने आते ही चाय की प्याली उठाई, सुड़ककर एक घूंट भरा और बोले “भैया, जमाना बड़ी तेजी से बदल रहा है! कल तक जनता आंदोलन करती थी तो ट्रेन रुक जाती थी, आज सरकार कोई फैसला ले ले तो ट्रेन ही रुक जाती है! अब बताओ, इसे विकास की नई परिभाषा कहें या वक्त का जादू-मंतर?”
पहले का जमाना भी बड़ा निराला था। कहीं आंदोलन हुआ, कहीं नारे लगे, कहीं पटरियों पर प्रदर्शनकारियों का जमावड़ा हुआ और रेलगाड़ियों के पहिए थम गए। आंदोलनकारी सीना ठोककर कहते थे “हमारी मांगें मानो, वरना रास्ता रोक देंगे!” यात्रियों की सांस अटकती थी, रेलवे की व्यवस्था हांफती थी और प्रशासन की नींद उड़ जाती थी।
लेकिन अब सेंटी गुरु को वक्त की पटकथा में नया मोड़ नजर आ रहा है। गुरु बोले “अरे भैया, पहले ट्रेन रोकने के लिए आंदोलन करना पड़ता था, अब ट्रेन रोकने के लिए किसी आंदोलन की जरूरत ही नहीं! कभी तकनीकी कारण, कभी परिचालन संबंधी समस्या, कभी सुरक्षा का मामला… वजह कोई भी हो सकती है। नतीजा वही यात्री प्लेटफॉर्म पर खड़ा घड़ी देख रहा है और घड़ी यात्री को देखकर मुस्कुरा रही है!”
सेंटी गुरु ने चश्मा ठीक किया और बोले “पहले जनता कहती थी, हमारी आवाज सुनो, तभी ट्रेन चलेगी। अब जनता कहती है, भाई साहब! ट्रेन तो चला दो, बाकी आवाज रास्ते में सुन लेना!”
फिर गुरु ने ठहाका लगाया “वाह रे लोकतंत्र! पहले आंदोलनकारी ट्रेन रोकते थे, अब ट्रेन रुकने पर आंदोलनकारी ढूंढ़े जाते हैं! पहले पटरी पर विरोध दिखता था, अब प्लेटफॉर्म पर इंतजार दिखता है। बस फर्क इतना है कि पहले पहिए रोकने के पीछे मांग होती थी, अब पहिए रुकने के पीछे कारण पूछना पड़ता है!”
हालांकि गुरु यह भी साफ करते हैं कि हर ट्रेन का रुकना सरकार का फैसला नहीं होता। रेलवे की तकनीकी, परिचालन और सुरक्षा संबंधी परिस्थितियां भी होती हैं। मगर सवाल तो तब उठता है, जब आम आदमी को समय पर मंजिल तक पहुंचने की चिंता सताती है और उसे जवाब के बजाय सिर्फ इंतजार मिलता है।
अंत में सेंटी गुरु ने प्याली खाली की, मूंछों पर ताव दिया और बोले “भैया, राजनीति हो या रेलवे, असली कमाल तो यही है कि कहानी वही रहती है, किरदार बदल जाते हैं! कल तक ट्रेन रोकने वाले आंदोलनकारी सुर्खियों में थे, आज ट्रेन रुकने की वजह सुर्खियों में है। इसे ही कहते हैं जादू-मंतर का आधुनिक संस्करण!”
सेंटी गुरु का आखिरी तंज:
“पहले ट्रेन रोकने के लिए आंदोलन करना पड़ता था, अब ट्रेन रुक जाए तो कारण जानने के लिए आंदोलन करना पड़ सकता है! वाह रे वक्त, तेरी लीला अपरंपार… बस यात्री की टिकट और धैर्य, दोनों न हों बेकार!”
सेंटी गुरु


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