अगर आज रावण जिंदा होता और चुनाव लड़ने का ऐलान कर देता, तो यकीन मानिए, लंका से लेकर दिल्ली तक राजनीतिक गलियारों में भूचाल आ जाता। पुष्पक विमान उसका प्रचार वाहन होता, सोने की लंका उसका चुनाव कार्यालय और दस सिर उसकी सबसे बड़ी चुनावी ताकत!
रावण जनता के बीच पहुंचकर कहता “भाइयो-बहनो! मेरे दस सिर हैं, इसलिए दस गुना दिमाग है। बीस हाथ हैं, इसलिए बीस गुना विकास करूंगा। विरोधियों के पास एक सिर है, वे मेरा मुकाबला क्या करेंगे?”

उसका घोषणा पत्र भी कम धमाकेदार नहीं होता। हर गरीब को सोने का मकान, हर बेरोजगार को पुष्पक विमान में नौकरी, हर गांव में स्वर्ण सड़क और हर शहर में लंका जैसी चमक-दमक! महंगाई खत्म करने का वादा करते हुए वह कहता “सोना इतना सस्ता कर दूंगा कि लोग पीतल को देखकर पहचानना भूल जाएंगे!”
चुनावी मंच पर विपक्ष सवाल उठाता “महाराज, आपने सीता हरण क्यों किया था?”
रावण मुस्कुराकर जवाब देता “वह पुराना मामला है। जांच चल रही है। मेरी छवि खराब करने के लिए विपक्ष रामायण के पन्ने पलट रहा है। पहले यह बताइए कि आपने अपने कार्यकाल में क्या किया?”
बस फिर क्या था समर्थक नारे लगाने लगते और सोशल मीडिया पर हैशटैग ट्रेंड करने लगता ‘रावण हटाओ या रावण लाओ!’ कुछ लोग उसे विद्वान बताते, कुछ महापंडित और कुछ कहते कि कम से कम उसके पास दस सिर तो हैं, हमारे नेता तो एक सिर से भी काम नहीं चला पा रहे!
चुनाव आयोग के सामने भी नई चुनौती होती। रावण को कितने चुनावी खर्च की सीमा मिले? दस सिरों के लिए दस अलग-अलग भाषणों का हिसाब कौन रखे? और अगर हर सिर अलग वादा करे, तो जनता किस वादे पर भरोसा करे?
आज राजनीति में चेहरे बदलते हैं, वादे बदलते हैं और चुनावी मुद्दे बदलते हैं। लेकिन जनता की उम्मीदें हर बार वही रहती हैं। रावण के दस सिर बुराई के प्रतीक थे, मगर आज असली सवाल सिरों की संख्या का नहीं, नीयत की गुणवत्ता का है।
क्योंकि साहब, रावण तो हर साल जल जाता है, लेकिन उसके चुनावी वादों का पुतला आज तक नहीं जला!
सेंटी गुरु





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