22 अक्टूबर, 2026  |  08:42 IST
Jila Nazar
गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026
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टेशू-झांझी: अधूरी प्रेमकथा, वीरता और लोकगीतों की सदियों पुरानी परंपरा

अनमोल रागिनी “चुनमुन”... ✍️

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टेशू-झांझी: अधूरी प्रेमकथा, वीरता और लोकगीतों की सदियों पुरानी परंपरा

महाभारत के वीर बर्बरीक से जुड़ी लोकमान्यता, शरद पूर्णिमा पर प्रतीकात्मक विवाह और ब्रज की गलियों में गूंजते गीत—आधुनिकता के दौर में अपनी पहचान बचाने की जद्दोजहद करती लोकसंस्कृति

भारत की सांस्कृतिक विरासत में अनेक ऐसे लोकपर्व हैं, जिनमें इतिहास, लोकविश्वास, प्रेम, त्याग और सामाजिक समरसता के रंग एक साथ दिखाई देते हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ब्रज क्षेत्र, बुंदेलखंड और आसपास के इलाकों में प्रचलित टेशू-झांझी का खेल ऐसी ही अनूठी लोकपरंपरा है। दशहरे के बाद से शरद पूर्णिमा तक बच्चों की टोलियों द्वारा टेशू-झांझी लेकर घर-घर जाना, लोकगीत गाना और अंत में प्रतीकात्मक विवाह की रस्म निभाना इस परंपरा की खास पहचान रही है। 

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यह परंपरा केवल बच्चों का मनोरंजक खेल नहीं, बल्कि लोकजीवन की सामूहिकता, पारिवारिक संस्कारों और मौखिक लोकसाहित्य की अनमोल धरोहर है।

टेशू और झांझी की ऐतिहासिक लोककथा

लोकमान्यता के अनुसार, टेशू की कथा का संबंध महाभारत के वीर बर्बरीक से है। बर्बरीक को घटोत्कच का पुत्र और भीम का पौत्र माना जाता है। प्रचलित धार्मिक कथाओं में उन्हें अद्भुत पराक्रम और युद्धकौशल वाला योद्धा बताया गया है।

कथा के अनुसार, महाभारत युद्ध से पहले बर्बरीक ने श्रीकृष्ण के सामने अपनी वीरता और युद्ध देखने की इच्छा व्यक्त की। युद्ध में उनके संभावित प्रभाव को देखते हुए श्रीकृष्ण ने उनसे शीशदान मांगा। बर्बरीक ने अपना शीश दान कर दिया। लोककथा के एक प्रचलित रूप में श्रीकृष्ण उनके शीश को ऊंचे स्थान पर स्थापित करते हैं, जहां से वे महाभारत का युद्ध देख सकें।

इसी कथा के एक क्षेत्रीय रूप में बर्बरीक की प्रेमिका झांझी अथवा गड़बड़ा का उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि बर्बरीक ने उससे विवाह करने का वचन दिया था, लेकिन शीशदान के कारण उनकी प्रेमकथा अधूरी रह गई। लोकविश्वास के अनुसार, इसी अधूरे मिलन की स्मृति में शरद पूर्णिमा के अवसर पर टेशू-झांझी का प्रतीकात्मक विवाह कराया जाने लगा।

यह उल्लेखनीय है कि बर्बरीक और टेशू की पहचान तथा इस विवाह परंपरा की उत्पत्ति को जोड़ने वाली कथा लोकमान्यताओं पर आधारित है। इसे महाभारत के प्रमाणित ऐतिहासिक प्रसंग के रूप में नहीं, बल्कि क्षेत्रीय लोककथा के रूप में समझना चाहिए। 

एक दूसरी लोककथा भी है प्रचलित

कुछ क्षेत्रों में झांझी से जुड़ी एक अन्य लोककथा सुनाई जाती है। इसके अनुसार, सुआटा नामक राक्षस कन्याओं को परेशान करता था। उसकी प्रताड़ना से मुक्ति पाने के लिए कन्याओं ने देवी गौरी की आराधना की। लोककथा में वीर टेशू द्वारा सुआटा का वध करने और उसकी पुत्री झांझी से विवाह करने का वर्णन मिलता है।

इस कथा के अलग-अलग रूप स्थानीय परंपराओं में मिलते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि लोकसंस्कृति किसी एक लिखित ग्रंथ तक सीमित नहीं रहती, बल्कि समय, क्षेत्र और जनस्मृतियों के साथ उसके अनेक रूप विकसित होते रहते हैं। 

तीन लकड़ियों का टेशू और दीपों से जगमगाती झांझी

परंपरागत रूप से टेशू को तीन लकड़ियों या सरकंडों के सहारे खड़ा किया जाता है। उसके ऊपर मनुष्य जैसी आकृति सजाई जाती है। कहीं उसे रंगीन कपड़े पहनाए जाते हैं, तो कहीं मूंछों और अन्य सजावटी वस्तुओं से आकर्षक बनाया जाता है।

दूसरी ओर, झांझी मिट्टी की छोटी मटकी या घड़े के रूप में तैयार की जाती है। इसमें छोटे-छोटे छेद होते हैं और भीतर दीपक जलाया जाता है। दीपक का प्रकाश छिद्रों से बाहर निकलता है तो झांझी जगमगा उठती है।

दशहरे के बाद बच्चे टेशू और झांझी लेकर गलियों तथा मोहल्लों में निकलते थे। वे लोकगीत गाते और घरों से नेग के रूप में रुपये, अनाज अथवा अन्य सामग्री प्राप्त करते थे। एकत्रित सामग्री का उपयोग कई जगह प्रतीकात्मक विवाह के आयोजन में किया जाता था। 

लोकगीतों में बसता है टेशू-झांझी का संसार

इस परंपरा की आत्मा इसके लोकगीत हैं। इन गीतों में हास्य, बालसुलभ शरारत, मांगने की चुटीली शैली और स्थानीय बोली की मिठास दिखाई देती है। ब्रज क्षेत्र में गाया जाने वाला एक लोकप्रिय गीत है-

“मेरा टेसू यहीं खड़ा,

खाने को मांगे दही बड़ा।”

इसी तरह एक अन्य प्रचलित गीत की पंक्तियां हैं-

“टेसू के रे टेसू के,

टेसू बैठो आंगन में।”

इन गीतों के अलग-अलग स्थानीय रूप मिलते हैं। कहीं बच्चे टेसू की फरमाइशों का वर्णन करते हैं, तो कहीं मजाकिया अंदाज में घरवालों से नेग मांगते हैं।

"मेरी झांझी की उरकन, मुरकन

दो मोती मोहि पाएरी"।

झांझी के गीतों में विवाह, सुहाग, मंगलकामना और पारिवारिक जीवन की झलक मिलती है।

लोकगीतों की विशेषता यह है कि इन्हें किसी औपचारिक मंच की आवश्यकता नहीं होती। गली-मोहल्ले, घर का आंगन और बच्चों की टोली ही इनके मंच बन जाते हैं। मौखिक परंपरा से एक पीढ़ी के गीत दूसरी पीढ़ी तक पहुंचते रहते हैं। 

शरद पूर्णिमा पर सजती थी प्रतीकात्मक बारात

इस लोकपर्व का विशेष आकर्षण टेशू-झांझी का विवाह माना जाता है। शरद पूर्णिमा के अवसर पर कई स्थानों पर विवाह की तैयारियां की जाती थीं। टेशू की ओर से बाराती और झांझी की ओर से घराती बनते थे। कहीं ढोलक और थाली-चम्मच बजाकर बारात निकाली जाती थी, तो कहीं मंगलगीतों के बीच विवाह की रस्में पूरी होती थीं।

कुछ इलाकों में बाकायदा निमंत्रण दिया जाता था, मोहल्ले के लोग एकत्र होते थे और बच्चों के लिए सामूहिक भोज भी आयोजित किया जाता था। विवाह के बाद टेशू-झांझी का विसर्जन करने की परंपरा भी कई क्षेत्रों में प्रचलित रही है। हालांकि रस्मों और आयोजन के स्वरूप में स्थानीय स्तर पर अंतर मिलता है। 

आधुनिकता की दौड़ में धुंधली पड़ती विरासत

आज मोबाइल फोन, इंटरनेट और डिजिटल मनोरंजन के दौर में टेशू-झांझी का खेल पहले की तुलना में सीमित होता दिखाई देता है। बच्चों की टोलियां, घर-घर गूंजते लोकगीत और सामूहिक विवाह के आयोजन कई स्थानों पर दुर्लभ हो गए हैं। फिर भी ब्रज और आसपास के कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में यह परंपरा अब भी जीवित है। 

इस विरासत को बचाने के लिए विद्यालयों, सांस्कृतिक संस्थाओं और स्थानीय समुदायों को आगे आना चाहिए। बच्चों को टेशू-झांझी बनाने, पुराने लोकगीत सीखने और परंपरागत विवाह आयोजन को समझने के अवसर दिए जाने चाहिए। बुजुर्गों से इन गीतों और कथाओं को संकलित कर सुरक्षित रखना भी जरूरी है।

टेशू-झांझी केवल मिट्टी की मटकी, लकड़ियों से बने पुतले और कुछ लोकगीतों का नाम नहीं है। यह प्रेम, त्याग, वीरता, सामूहिकता और सांस्कृतिक स्मृति का प्रतीक है। समय के साथ इसके स्वरूप में बदलाव स्वाभाविक है, लेकिन इसकी आत्मा को जीवित रखना समाज की जिम्मेदारी है। यदि नई पीढ़ी इन लोकगीतों को फिर से गुनगुनाने लगे, तो टेशू-झांझी अतीत की धुंधली कहानी नहीं, बल्कि हमारी जीवंत सांस्कृतिक पहचान बनकर आने वाले समय में भी चमकता रहेगा।

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