उज्जैन। दशहरे से पहले धार्मिक नगरी उज्जैन में रावण दहन की सदियों पुरानी परंपरा को लेकर नई बहस छिड़ गई है। महाकाल मंदिर से जुड़े पुजारी महेश पुजारी ने रावण दहन का आयोजन करने वाली चार संस्थाओं को नोटिस भेजकर धार्मिक ग्रंथों के आधार पर शास्त्रार्थ की चुनौती दी है। उनके इस कदम ने धार्मिक परंपराओं और शास्त्रीय प्रमाणों को लेकर चर्चा तेज कर दी है।
महेश पुजारी का तर्क है कि वाल्मीकि रामायण और गोस्वामी तुलसीदास की रामचरितमानस में भगवान श्रीराम द्वारा रावण वध का वर्णन मिलता है, लेकिन रावण का पुतला जलाने की परंपरा का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता। उन्होंने संबंधित संस्थाओं से अपने आयोजन के समर्थन में शास्त्रीय प्रमाण प्रस्तुत करने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि उन्हें धार्मिक ग्रंथों के आधार पर संतोषजनक प्रमाण मिलते हैं, तो वह अपना विरोध वापस लेने पर विचार करेंगे।
दूसरी ओर, देशभर में दशहरे पर रावण दहन को भगवान श्रीराम की विजय, अधर्म पर धर्म की जीत और बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। यह परंपरा केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक संदेश से भी जुड़ी हुई है।
ऐसे में उज्जैन में उठे इस सवाल ने एक व्यापक विमर्श को जन्म दिया है। एक पक्ष शास्त्रीय प्रमाणों पर जोर दे रहा है, जबकि दूसरा रावण दहन को सांस्कृतिक परंपरा और प्रतीकात्मक उत्सव के रूप में देखता है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि शास्त्रार्थ की चुनौती के बाद यह विवाद किस दिशा में आगे बढ़ता है।





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