23 अक्टूबर, 2026  |  09:00 IST
Jila Nazar
शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2026
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ऑनलाइन आरटीआई: पारदर्शिता का दावा, जवाबदेही की अग्निपरीक्षा

संपादकीय... ✍️

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ऑनलाइन आरटीआई: पारदर्शिता का दावा, जवाबदेही की अग्निपरीक्षा

सूचना का अधिकार डिजिटल हुआ, लेकिन क्या आम नागरिक को समय पर न्याय और जवाब मिल रहा है?

सूचना का अधिकार अधिनियम यानी आरटीआई लोकतंत्र में नागरिकों की सबसे प्रभावशाली शक्तियों में से एक है। इसका उद्देश्य सरकारी कामकाज में पारदर्शिता लाना, भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना और अधिकारियों को जनता के प्रति जवाबदेह बनाना है। ऑनलाइन आरटीआई व्यवस्था ने इस अधिकार के इस्तेमाल को आसान बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया है। अब घर बैठे आवेदन करना संभव है, लेकिन सवाल यह है कि क्या डिजिटल सुविधा के साथ जवाबदेही भी उतनी ही मजबूत हुई है?

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सरकारें ई-गवर्नेंस और डिजिटल पारदर्शिता को सुशासन का प्रतीक बताती हैं। ऑनलाइन आवेदन, शुल्क भुगतान और आवेदन की स्थिति जानने जैसी सुविधाएं नागरिकों का समय और श्रम बचाती हैं। दूर-दराज के क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए भी यह व्यवस्था उपयोगी साबित हो सकती है। मगर तकनीक की चमक के पीछे कुछ ऐसी व्यावहारिक परेशानियां हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

आम नागरिक की शिकायत है कि आवेदन करने के बाद भी कई बार उसे स्पष्ट, पूर्ण और समयबद्ध सूचना नहीं मिलती। कहीं आवेदन गलत विभाग में भेजे जाने की समस्या है, तो कहीं अस्पष्ट जवाब देकर जिम्मेदारी से बचने की शिकायत सामने आती है। तकनीकी जानकारी का अभाव, पोर्टल संबंधी कठिनाइयां और ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल सुविधाओं की सीमित उपलब्धता भी इस अधिकार तक पहुंच को प्रभावित करती हैं।

कानून के तहत सामान्यतः आरटीआई आवेदन का जवाब 30 दिनों के भीतर दिया जाना चाहिए। लेकिन निर्धारित समयसीमा और वास्तविक अनुभव के बीच अंतर रह जाए, तो नागरिक का भरोसा कमजोर होता है। सूचना न मिलने पर प्रथम अपील और उसके बाद संबंधित सूचना आयोग में दूसरी अपील का रास्ता मौजूद है, मगर इन प्रक्रियाओं में भी समय और प्रयास लगता है।

यह भी समझना होगा कि हर सूचना सार्वजनिक नहीं हो सकती। कानून में राष्ट्रीय सुरक्षा, व्यक्तिगत निजता और अन्य निर्धारित परिस्थितियों में छूट का प्रावधान है। इसलिए पारदर्शिता का अर्थ नियमों की अनदेखी नहीं, बल्कि कानून के अनुरूप उचित सूचना उपलब्ध कराना है।

अब जरूरत केवल ऑनलाइन पोर्टल बढ़ाने की नहीं, बल्कि जवाबदेही की व्यवस्था मजबूत करने की है। आवेदन की निगरानी, समयसीमा का पालन, स्पष्ट जवाब, अपीलों का त्वरित निस्तारण और लापरवाही पर नियमानुसार कार्रवाई सुनिश्चित होनी चाहिए।

लोकतंत्र में पारदर्शिता का प्रमाण सरकारी दावों से नहीं, नागरिक को मिले जवाब से तय होता है। ऑनलाइन आरटीआई तभी सफल मानी जाएगी, जब स्क्रीन पर आवेदन दर्ज होने के साथ सरकारी व्यवस्था में जवाबदेही भी दर्ज हो। आखिर सूचना मांगना नागरिक का अधिकार है, किसी अधिकारी की कृपा नहीं।

  सन्त कुमार भारद्वाज

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