अरे ओ खबरों के ठेकेदारों! जरा कैमरे का मेकअप उतारिए, स्टूडियो की चकाचौंध से बाहर आइए और बताइए—पत्रकार वह, जो खबर खोजता है या वह, जो दूसरे की खोजी खबर को चमकदार पैकेट में पैक करके बेचता है?
सेंटी गुरु ने चाय की चुस्की ली, चश्मा नाक पर चढ़ाया और सीधे मीडिया की दुखती रग पर उंगली रख दी।

किस्सा कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे का है। दावा है कि करीब 4200 करोड़ रुपये की लागत से बना एक्सप्रेसवे उद्घाटन के महज 14 दिन बाद ही धंसने लगा। 27 जुलाई को उन्नाव के कोरारी गांव के पास एक रीलबाज ने इसका वीडियो सोशल मीडिया पर डाल दिया। वीडियो वायरल हुआ, लाखों लोगों तक पहुंचा और फिर डिजिटल मीडिया से होते हुए टीवी के चमचमाते स्टूडियो तक जा पहुंचा।
अब सेंटी गुरु का सवाल है
पहली बार जमीन पर धंसी सड़क दिखाने वाला बड़ा या उसी सड़क की खबर को पचासवीं बार पढ़ने वाला?
एक तरफ वह शख्स, जो मौके पर पहुंचा, कैमरा निकाला और सिस्टम की दरार दुनिया को दिखा दी। दूसरी तरफ वह संस्थागत मीडिया, जो वायरल वीडियो मिलने के बाद स्टूडियो में बैठकर खबर का पोस्टमार्टम करने लगा। एंकर की साड़ी, हेयर स्टाइल और मेकअप अपनी जगह, लेकिन खबर का असली मेकअप तो तथ्य, पड़ताल और सवालों से होता है महाराज!
हालांकि सेंटी गुरु यह भी साफ कर दें हर रीलबाज पत्रकार नहीं और हर टीवी पत्रकार खबरों का डाकिया नहीं। असली पत्रकारिता का पैमाना कैमरे का आकार नहीं, सूचना की विश्वसनीयता, जमीनी पड़ताल और सत्ता से सवाल पूछने का साहस है।
लेकिन जब खबर की पहली घंटी सोशल मीडिया बजाए और बड़े-बड़े न्यूजरूम उसी घंटी की गूंज पकड़कर दौड़ें, तो संस्थागत मीडिया को आत्ममंथन करना ही पड़ेगा।
सेंटी गुरु ने न्यूटन का तीसरा नियम याद दिलाया हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। खबर दबाने की कोशिश बढ़ेगी तो वैकल्पिक मंचों की जरूरत भी बढ़ सकती है। दीवारों के कान कभी सत्ता की परेशानी थे, आज मोबाइल के कैमरे भी वही सवाल पूछ रहे हैं।
अब सुप्रीम कोर्ट में पत्रकार की पहचान पर सवाल उठने की चर्चा के बीच सेंटी गुरु की सलाह है पत्रकारिता को न महंगे स्टूडियो से प्रमाणपत्र चाहिए, न वायरल व्यूज से। उसे चाहिए सच, सबूत और सवाल पूछने की हिम्मत।
क्योंकि सड़क धंसने से सरकार की साख पर सवाल उठते हैं, लेकिन खबर धंसने लगे तो लोकतंत्र की नींव हिलती है!
और जाते-जाते सेंटी गुरु बोले
“खबर को दबाने वाले याद रखें, कैमरा छोटा हो सकता है, लेकिन सवाल कभी छोटा नहीं होता। आज खबर रील में है, कल इतिहास की हेडलाइन में भी हो सकती है!”
सेंटी गुरु





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