अरे ओ भाई साहब! जरा अपनी जेब संभालकर रखिएगा, कहीं उसमें से निकले दो हजार रुपये भी भ्रष्टाचार का पहाड़ न बन जाएं! क्योंकि इस देश में भ्रष्टाचार की भी अपनी क्लास है। यहां कुर्सी जितनी छोटी, कार्रवाई उतनी बड़ी और कुर्सी जितनी ऊंची, जांच उतनी लंबी! वाह रे व्यवस्था, तेरे भी क्या ठाठ हैं!
सेंटी गुरु आज बड़े मूड में हैं। माथे पर चिंता की लकीरें और जुबान पर सवालों की फुलझड़ी लेकर मैदान में उतर आए हैं। पूछते हैं हुजूर, सिपाही के घर से नकदी मिले तो ईमानदारी का पोस्टमार्टम शुरू, बाबू की अलमारी से नोट निकलें तो भ्रष्टाचार का ढोल बजने लगे, लेकिन बड़े साहब की तिजोरी में करोड़ों की संपत्ति दिखाई दे जाए तो अचानक जांच एजेंसियों को चश्मे का नंबर बदलने की जरूरत क्यों पड़ जाती है?

गजब का तमाशा है! नीचे वाले पर छापा पड़े तो ब्रेकिंग न्यूज, ऊपर वाले पर सवाल उठे तो फाइलों में सन्नाटा! छोटी मछली जाल में फंसते ही भ्रष्टाचारी घोषित, मगर बड़े मगरमच्छ के मामले में पहले जांच, फिर पड़ताल, फिर पुनः जांच और आखिर में तारीख पर तारीख! लगता है भ्रष्टाचार की जांच नहीं, कोई सरकारी धारावाहिक चल रहा है, जिसका आखिरी एपिसोड किसी को मालूम ही नहीं!
लोकायुक्त, सीबीआई और ईडी की कार्रवाई से उम्मीदें जरूर जगती हैं। छापे पड़ते हैं, नोटों की गड्डियां दिखाई जाती हैं, संपत्तियों का हिसाब सामने आता है। लेकिन जनता का सवाल है कि कार्रवाई का तराजू सबके लिए बराबर क्यों नहीं दिखाई देता? क्या कानून की नजर भी पद, प्रभाव और रसूख देखकर फोकस बदल लेती है?
सेंटी गुरु की मानिए तो भ्रष्टाचार की सफाई में झाड़ू नीचे से ऊपर तक चलनी चाहिए। चपरासी की जेब से लेकर बड़े साहब की तिजोरी तक हर संपत्ति का हिसाब होना चाहिए। आय से अधिक संपत्ति का सवाल हो तो पद छोटा-बड़ा नहीं, सबूत महत्वपूर्ण होना चाहिए।
और हां साहब! कुर्सी ऊंची होने से चरित्र का कद अपने आप ऊंचा नहीं हो जाता। जनता अब केवल छापे की तस्वीर नहीं, कार्रवाई का अंजाम भी देखना चाहती है।
सेंटी गुरु अंत में बोले, वाह रे भ्रष्टाचार! नीचे वालों के लिए हथकड़ी तैयार, ऊपर वालों के लिए जांच की कुर्सी आरामदार!
संजय एम तराणेकर





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