लोकतंत्र में चुनाव केवल चेहरे, दल और सियासी समीकरणों का मुकाबला नहीं होते, बल्कि वे दावों और हकीकत के बीच का अंतर भी उजागर करते हैं। आगरा खंड शिक्षक एमएलसी चुनाव में इंजीनियर हरिकिशोर तिवारी की पराजय और मतगणना के दौरान सामने आए विवादों ने कर्मचारी संगठनों की कथित राजनीतिक ताकत पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सत्ता के गलियारों में अक्सर कुछ कर्मचारी संगठन के पदाधिकारी बड़े नेताओं के आसपास अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराते दिखाई देते हैं। शानदार गाड़ियां, महंगे परिधान और प्रभावशाली राजनीतिक संपर्क उनकी पहचान बन जाते हैं। वे अपने संगठनों की सदस्य संख्या और समर्थकों के विशाल आधार का हवाला देकर राजनीतिक दलों को अपनी उपयोगिता का भरोसा दिलाते हैं। लेकिन चुनावी नतीजे कई बार इन दावों की वास्तविकता सामने रख देते हैं।

इंजीनियर हरिकिशोर तिवारी का राजनीतिक सफर भी कम दिलचस्प नहीं रहा। कर्मचारी संगठनों में लंबे समय तक नेतृत्व करने के बाद उन्होंने 2020 में आगरा खंड स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा और 19,020 मत पाकर तीसरे स्थान पर रहे। वर्ष 2021 में समाजवादी पार्टी से जुड़े और फरवरी 2024 में भाजपा में शामिल हो गए। भाजपा ने 2026 में उन्हें शिक्षक एमएलसी का प्रत्याशी बनाया। स्वाभाविक था कि कर्मचारी संगठनों के प्रभाव और सत्ता पक्ष के समर्थन से उनकी जीत की उम्मीदें बढ़ गईं।
लेकिन चुनाव परिणाम ने इन उम्मीदों को झटका दिया। सपा प्रत्याशी डॉ. आकाश अग्रवाल ने उन्हें पराजित कर दिया। इसके बाद आरोप-प्रत्यारोप और मतगणना के दौरान हुई कुर्ता फाड़ राजनीति ने लोकतांत्रिक मर्यादाओं पर भी सवाल खड़े किए।
अब सवाल केवल हार-जीत का नहीं, बल्कि उन कथित वोट बैंकों का भी है, जिनके भरोसे राजनीतिक रणनीतियां बनाई जाती हैं। क्या कर्मचारी संगठनों का पदाधिकारियों तक सीमित प्रभाव वास्तव में मतपेटियों तक पहुंचता है? क्या नेताओं के आसपास भीड़ जुटाना जनसमर्थन का प्रमाण है?
राजनीतिक दलों को समझना होगा कि चमकते कुर्ते, प्रभावशाली संपर्क और बड़ी-बड़ी बातें चुनाव नहीं जितातीं। जीत का रास्ता जनता और मतदाताओं के बीच से होकर गुजरता है। कर्मचारी संगठनों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन उन्हें किसी दल का सुनिश्चित वोट बैंक मान लेना राजनीतिक भूल है।
इस चुनाव का सबसे बड़ा सबक यही है कि आरोपों से पहले आत्ममंथन जरूरी है। लोकतंत्र में मतदाता सर्वोपरि है, न कि नेताओं के आसपास दिखाई देने वाली भीड़। विजयी प्रत्याशी डॉ. आकाश अग्रवाल को बधाई, लेकिन साथ ही सभी राजनीतिक दलों के लिए यह परिणाम आत्मचिंतन का अवसर भी है।
सन्त कुमार भारद्वाज





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