1 नवंबर, 2026  |  00:40 IST
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एमएलसी चुनाव: संगठन की सुस्ती ने दिखाया आईना

संपादकीय... ✍️

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एमएलसी चुनाव: संगठन की सुस्ती ने दिखाया आईना

उत्तर प्रदेश विधान परिषद की 11 सीटों के चुनाव परिणाम केवल राजनीतिक दलों की सीटों का लेखा-जोखा नहीं, बल्कि सत्ता और संगठन के संबंधों का आईना भी हैं। भाजपा ने छह सीटों पर अपनी स्थिति बरकरार रखी, जबकि समाजवादी पार्टी ने अपनी संख्या में दो सीटों का इजाफा किया। मगर इन आंकड़ों से अधिक चर्चा काशी और लखनऊ जैसे महत्वपूर्ण केंद्रों में भाजपा को मिली शिकस्त की है। इन परिणामों ने संगठन की सक्रियता, चुनावी प्रबंधन और नेतृत्व की प्राथमिकताओं पर नए प्रश्न खड़े किए हैं।

राजनीति में विजय का श्रेय नेतृत्व को मिलता है, लेकिन पराजय की जिम्मेदारी अक्सर निचले पायदान के कार्यकर्ताओं पर डाल दी जाती है। यही प्रवृत्ति किसी भी दल के संगठनात्मक स्वास्थ्य के लिए घातक है। यदि पार्टी का परंपरागत समर्थक मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के बावजूद मतदान से वंचित रह जाता है, अथवा उसका नाम सूची में जुड़वाने की प्रक्रिया ही अधूरी रह जाती है, तो यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि संगठनात्मक निगरानी की विफलता भी है। शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाता सूची का प्रबंधन चुनावी सफलता की बुनियादी शर्त है।

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समाजवादी पार्टी की सफलता को भी इसी संदर्भ में देखने की जरूरत है। स्थानीय समीकरणों के अनुरूप प्रत्याशियों का चयन, कार्यकर्ताओं की सक्रियता और मतदाताओं से निरंतर संवाद ने उसे लाभ पहुंचाया हो सकता है। इसके विपरीत, भाजपा के लिए बड़े नेताओं की लोकप्रियता और सत्ता की उपलब्धियों पर अत्यधिक निर्भरता पर्याप्त साबित नहीं हुई। हालांकि, इन नतीजों को पूरे प्रदेश के जनमत का निर्णायक संकेत मानना भी उचित नहीं होगा, क्योंकि विधान परिषद के शिक्षक और स्नातक चुनावों की प्रकृति सामान्य विधानसभा चुनावों से अलग होती है।

सबसे महत्वपूर्ण सवाल सरकार और संगठन के बीच संतुलन का है। जब संगठन की ऊर्जा पदों, प्रोटोकॉल और औपचारिक बैठकों में सिमटने लगे, तब कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद कमजोर पड़ने लगता है। राजनीति में बूथ और मतदाता के बीच की दूरी किसी भी बड़े राजनीतिक दावे को खोखला कर सकती है।

काशी और लखनऊ के परिणाम भाजपा के लिए आत्मनिरीक्षण का अवसर हैं। उसे चुनावी रणनीति, मतदाता सूची प्रबंधन और स्थानीय नेतृत्व की जवाबदेही की समीक्षा करनी चाहिए। दूसरी ओर, सपा को भी इन सफलताओं को स्थायी जनसमर्थन का प्रमाण मानने के बजाय संगठनात्मक मजबूती बनाए रखने पर ध्यान देना होगा।

लोकतंत्र में कोई किला अभेद्य नहीं होता। सत्ता का प्रभाव और नेतृत्व का आकर्षण तभी टिकाऊ बनते हैं, जब उनके पीछे सक्रिय संगठन और भरोसेमंद कार्यकर्ता खड़े हों। चुनाव का असली सबक यही है कि राजनीति में प्रतिष्ठा शीर्ष नेतृत्व से बन सकती है, लेकिन उसकी रक्षा जमीन पर काम करने वाला संगठन ही करता है।

सन्त कुमार भारद्वाज

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