नितेश तिवारी की फिल्म ‘रामायण’ में अभिनेत्री साई पल्लवी को सीता की भूमिका दिए जाने पर उठी बहस अब अभिनय और सिनेमाई कल्पना से आगे बढ़कर समाज की मानसिकता का आईना बन गई है। सोशल मीडिया पर उनके रंग, घुंघराले बाल और चेहरे की बनावट को लेकर टिप्पणियां की जा रही हैं। सवाल यह है कि क्या सीता की गरिमा की रक्षा के नाम पर किसी जीवित स्त्री की गरिमा को ठेस पहुंचाना उचित है? क्या देवत्व का निर्धारण भी अब त्वचा के रंग से होगा?
साई पल्लवी की कास्टिंग पर उठे सवालों ने खोली समाज की रंगभेदी मानसिकता, आस्था के नाम पर किसी स्त्री के रूप-रंग का अपमान कितना उचित?
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सीता भारतीय संस्कृति में त्याग, धैर्य, आत्मसम्मान और नारी शक्ति की प्रतीक हैं। उनका व्यक्तित्व किसी एक चेहरे या शारीरिक बनावट तक सीमित नहीं है। वाल्मीकि रामायण, रामचरितमानस और विभिन्न क्षेत्रीय रामकथाओं में पात्रों की प्रस्तुतियों में समय और समाज के अनुसार विविधता रही है। ऐसे में सीता की छवि को किसी एक अभिनेत्री या पुराने टेलीविजन संस्करण की तस्वीर में कैद कर देना हमारी सांस्कृतिक परंपरा को सीमित करना है।
1987 में प्रसारित रामानंद सागर की रामायण में दीपिका चिखलिया ने सीता की भूमिका निभाकर दर्शकों के मन में अमिट छाप छोड़ी। उनकी लोकप्रियता इतनी व्यापक रही कि कई पीढ़ियों के लिए वही सीता की पहचान बन गईं। लेकिन किसी कलाकार की लोकप्रियता दूसरी अभिनेत्री के लिए रास्ते बंद करने का आधार नहीं हो सकती। विरासत का सम्मान नई व्याख्याओं को स्वीकार करने में है, न कि उन्हें खारिज करने में।
इस विवाद की जड़ समाज में गहराई तक बैठा रंगभेद भी है। बाजार और विज्ञापनों ने वर्षों तक गोरी त्वचा को सुंदरता का पर्याय बनाकर प्रस्तुत किया है। महिलाओं को विशेष रूप से यह संदेश दिया जाता रहा कि आकर्षक दिखने के लिए रंग निखारना जरूरी है। दुर्भाग्य से यही मानसिकता अब धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक प्रतीकों की व्याख्या में भी दिखाई देने लगी है।
साई पल्लवी की पहचान उनकी अभिनय प्रतिभा और सहज व्यक्तित्व से बनी है। उन्होंने कथित तौर पर करोड़ों रुपये के फेयरनेस क्रीम विज्ञापन को भी ठुकराया था। ऐसे में उनके रंग-रूप को लेकर अपमानजनक टिप्पणियां करना उस सोच को बढ़ावा देना है, जिसमें महिला की योग्यता से पहले उसकी सुंदरता का मूल्यांकन किया जाता है।
रामायण जैसी महागाथा में वेशभूषा, संवाद, भाषा, अभिनय और निर्देशन पर सवाल उठाना दर्शकों का अधिकार है। लेकिन किसी कलाकार के प्राकृतिक रंग या शारीरिक बनावट को उसकी पात्रता का पैमाना बनाना अनुचित है। फिल्म देखने के बाद उसके अभिनय और प्रस्तुति की आलोचना की जा सकती है।
सीता की महानता उनके चेहरे की बनावट में नहीं, बल्कि उनके आत्मसम्मान, साहस और नैतिक दृढ़ता में निहित है। अशोक वाटिका में रावण के सामने उनका अडिग प्रतिरोध ही उनके चरित्र की वास्तविक शक्ति है।
आखिर हमें तय करना होगा कि हम सीता के आदर्शों को महत्व देते हैं या केवल उनकी एक कल्पित बाहरी छवि को।
सीता की गरिमा के नाम पर साई पल्लवी की रंगत का अपमान करना कैसी भक्ति है? आस्था का अर्थ सम्मान है, अपमान नहीं।






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