12 अक्टूबर, 2026  |  23:43 IST
Jila Nazar
सोमवार, 12 अक्टूबर 2026
विज्ञापन
Billboard 1275x450

चिंता का बोझ, सेहत पर चोट

संपादकीय :

⏱ 1 मिनट में पढ़ें👁 6 बार पढ़ा गया
चिंता का बोझ, सेहत पर चोट

मनुष्य का स्वास्थ्य केवल शरीर की स्थिति से निर्धारित नहीं होता, बल्कि उसकी मानसिक अवस्था भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जब मन लगातार चिंता, भय, तनाव और अनिश्चितता से घिरा रहता है, तो उसका प्रभाव धीरे-धीरे शरीर पर भी दिखाई देने लगता है। यही कारण है कि मानसिक बेचैनी को केवल मन की समस्या मानकर नजरअंदाज करना उचित नहीं है।

चिंता जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है। परिवार की जिम्मेदारियां, आर्थिक कठिनाइयां, रोजगार की अनिश्चितता, रिश्तों में तनाव और भविष्य की आशंकाएं मन को व्याकुल कर सकती हैं। समस्या तब गंभीर होने लगती है, जब चिंता अस्थायी भावना न रहकर व्यक्ति की दिनचर्या का स्थायी हिस्सा बन जाती है। ऐसी स्थिति में नींद प्रभावित हो सकती है, सिरदर्द, थकान, मांसपेशियों में तनाव, बेचैनी और पाचन संबंधी परेशानियां उभर सकती हैं। कुछ लोगों को दिल की धड़कन तेज होने या भूख में बदलाव जैसी समस्याएं भी महसूस होती हैं।

विज्ञापन
💬

ऐसी खबरें सबसे पहले पाएँ — हमें WhatsApp पर जोड़ें

खबर भेजने का नंबर: 7534805152

जुड़ें

वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो लंबे समय तक बना तनाव शरीर की तनाव-प्रतिक्रिया प्रणाली को प्रभावित कर सकता है। इससे नींद, प्रतिरक्षा तंत्र, रक्तचाप और चयापचय पर प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका बढ़ सकती है। हालांकि, प्रत्येक शारीरिक परेशानी का कारण चिंता ही हो, यह आवश्यक नहीं। इसलिए लक्षणों को केवल मानसिक तनाव मानकर छोड़ देना भी समझदारी नहीं है।

भारतीय जीवन-दर्शन में मन की शांति को सदैव महत्व दिया गया है। नियमित दिनचर्या, पर्याप्त नींद, संतुलित आहार, योग, ध्यान, प्राणायाम और शारीरिक गतिविधियां मानसिक संतुलन बनाए रखने में सहायक हो सकती हैं। अपनों से संवाद करना और अपनी परेशानियां साझा करना भी मन का बोझ हल्का करता है। यदि चिंता लंबे समय तक बनी रहे, दैनिक जीवन प्रभावित हो या स्वयं संभालना कठिन लगे, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की सहायता लेने में संकोच नहीं करना चाहिए।

आज की तेज रफ्तार जिंदगी में सफलता की दौड़ ने मनुष्य को सुविधाएं तो दी हैं, लेकिन सुकून के क्षण कम कर दिए हैं। ऐसे में यह समझना आवश्यक है कि स्वस्थ जीवन का अर्थ केवल रोगमुक्त शरीर नहीं, बल्कि संतुलित और शांत मन भी है।

अंततः, मन की चिंता को अनसुना करना स्वास्थ्य की अनदेखी करना है। शरीर की देखभाल के साथ मन को विश्राम देना भी जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है।

सन्त कुमार भारद्वाज

यह खबर शेयर करें
J
jilanazar.com · सम्पादकीय डेस्क jilanazar.com की और खबरें →

यह भी पढ़ें

टिप्पणियाँ

इस खबर पर सबसे पहले अपनी टिप्पणी करें।