1 नवंबर, 2026  |  18:00 IST
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ट्रैफिक प्रबंधन कोई रॉकेट साइंस नहीं है! आगरा की सड़कें जाम, दिमाग भी जाम!

गड्ढे, अतिक्रमण, बेतरतीब पार्किंग और बदहाल ट्रैफिक व्यवस्था ने सफर को बना दिया है सजा। मगर बीमारी सिर्फ सड़कों में नहीं, हमारी सोच में भी है आगरा चल रहा है या रेंग रहा ह…

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ट्रैफिक प्रबंधन कोई रॉकेट साइंस नहीं है! आगरा की सड़कें जाम, दिमाग भी जाम!

आगरा।गड्ढे, अतिक्रमण, बेतरतीब पार्किंग और बदहाल ट्रैफिक व्यवस्था ने सफर को बना दिया है सजा। मगर बीमारी सिर्फ सड़कों में नहीं, हमारी सोच में भी है आगरा चल रहा है या रेंग रहा है? यह सवाल उस हर आदमी से पूछिए, जो यमुना किनारा रोड, एमजी रोड, भगवान टॉकीज या फतेहाबाद रोड पर जाम में फंसा है। दस मिनट का सफर एक घंटे में पूरा होता है। हॉर्न चीखते हैं, लोग झल्लाते हैं और गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच जाता है। फिर सारा इल्जाम ट्रैफिक पुलिस के सिर! लेकिन क्या हर जाम के लिए पुलिस ही जिम्मेदार है? क्या बीमारी सिर्फ सड़कों में है? या हमारी सोच भी इसकी बड़ी वजह है? सच यह है कि आगरा का ट्रैफिक संकट सिर्फ खराब सड़कों और बढ़ती गाड़ियों का नतीजा नहीं है। यह हमारी बिगड़ती नागरिक समझ और बेतहाशा जल्दबाजी का आईना भी है।

सड़क पर जाम है, मगर असली जाम तो दिमाग में है भाई जान! यमुना आरती स्थल के पास, दो रोज पहले, पीछे रोंग साइड पर दनदनाते मोबाइक वाले ने मुझे गिरा दिया। विरोध करने पर बोला, रोड पर क्यों चलते हैं बुड्ढे लोग, घर बैठो! यानी चोरी और सीना जोरी, यही है जंगल का कानून!

आगरा की सड़कों पर निकलते ही अनुशासन की पोल खुल जाती है। किसी को रुकना मंजूर नहीं। कोई किसी को रास्ता नहीं देना चाहता। हर आदमी सबसे आगे निकलने की फिराक में है। गलत दिशा में गाड़ी चलाना, मनमाने यू-टर्न लेना, लेन बदलकर आगे निकलना और लाल बत्ती तोड़ना आम बात है। जेब्रा क्रॉसिंग पर पैदल चलने वालों को रास्ता देना तो जैसे शान के खिलाफ है। साइकिल सवार और राहगीर भगवान भरोसे हैं।हॉर्न बजाना राष्ट्रीय शौक बन गया है। आगे सड़क बंद है, फिर भी हॉर्न बजता रहेगा। मानो आवाज से गाड़ियां अपने आप उड़ने लगेंगी!

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