आगरा। सड़कों पर बढ़ता जाम अब केवल यातायात की समस्या नहीं, बल्कि नागरिक अनुशासन और प्रशासनिक व्यवस्था की गंभीर परीक्षा बन चुका है। यमुना किनारा रोड, एमजी रोड, भगवान टॉकीज और फतेहाबाद रोड पर रोजाना लगने वाला जाम लोगों के धैर्य की परीक्षा ले रहा है। दस मिनट का सफर एक घंटे में पूरा होता है। हॉर्न की कर्कश आवाज, वाहनों की लंबी कतारें और लोगों की झुंझलाहट शहर की रोजमर्रा की तस्वीर बन गई है।
सवाल है कि क्या हर जाम के लिए ट्रैफिक पुलिस ही जिम्मेदार है? क्या समस्या केवल खराब सड़कों, गड्ढों, अतिक्रमण और बेतरतीब पार्किंग तक सीमित है? सच्चाई यह है कि आगरा का यातायात संकट हमारी नागरिक जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ने का परिणाम भी है।

सड़क पर अनुशासन की धज्जियां उड़ती हैं। कोई गलत दिशा में वाहन दौड़ाता है, कोई मनमाने ढंग से यू-टर्न लेता है और कोई लेन बदलकर आगे निकलने की होड़ में दूसरों की राह रोक देता है। लालबत्ती का उल्लंघन और जेब्रा क्रॉसिंग पर पैदल यात्रियों को रास्ता न देना आम हो गया है। साइकिल सवार और राहगीर असुरक्षित महसूस करते हैं।
यमुना आरती स्थल के पास हाल ही में एक रोंग साइड से आ रहे बाइक सवार ने एक बुजुर्ग को गिरा दिया। विरोध करने पर उल्टा उन्हें ही सड़क पर चलने के लिए अपमानित किया गया। यह घटना बताती है कि समस्या केवल यातायात नियमों की नहीं, बल्कि हमारी सोच और व्यवहार की भी है।
ट्रैफिक प्रबंधन कोई रॉकेट साइंस नहीं है। बेहतर सड़कें, अतिक्रमण पर कार्रवाई, व्यवस्थित पार्किंग और प्रभावी यातायात नियंत्रण जरूरी हैं। लेकिन इन प्रयासों की सफलता तभी संभव है, जब नागरिक भी नियमों का पालन करें।
आगरा को जाम से मुक्ति दिलाने के लिए सड़कें ही नहीं, सोच भी बदलनी होगी। आखिर सड़क सबकी है, तो जिम्मेदारी भी सबकी है।





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