अरे! सेंटी गुरु : हाथ में झुनझुना, चेहरे पर मुस्कान और दिल में यमुना की बदहाली का दर्द लेकर गुरु आज आगरा की गलियों में निकल पड़े हैं। बोले, “वाह रे विकास! नदी सूख रही है, नाले उफन रहे हैं, लेकिन जनप्रतिनिधियों के कानों तक आवाज पहुंचाने के लिए अब झुनझुना बजाना पड़ रहा है!”
आगरा में यमुना की दुर्दशा को लेकर रिवर एक्टिविस्ट्स ने ऐसा अनोखा प्रदर्शन किया कि झुनझुना भी राजनीतिक हथियार बन गया। 'झुनझुना दिवस' पर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) आगरा के अध्यक्ष डॉ. हरेंद्र गुप्ता ने भी झुनझुना बजाकर जनप्रतिनिधियों को जगाने का संदेश दिया। यमुना के पुनर्जीवन, अविरल जलप्रवाह और बैराज निर्माण की मांग उठी। प्रदर्शनकारियों का नारा गूंजा - “आगरा को क्या मिला? झुनझुना, झुनझुना!”
सेंटी गुरु बोले, “भाई साहब, यह झुनझुना कोई बच्चों का खिलौना नहीं, बल्कि व्यवस्था के कानों में बजने वाली चेतावनी है। जब जनता की आवाज फाइलों में दब जाए, जब नदी की पीड़ा भाषणों में खो जाए और जब विकास के दावे धरातल पर दम तोड़ दें, तब जनता को झुनझुना ही बजाना पड़ता है।”
यमुना मैया की हालत देखिए। कभी आगरा की पहचान, कभी आस्था की धारा और कभी शहर की जीवनरेखा कही जाने वाली नदी आज प्रदूषण और बदहाली की मार झेल रही है। नदी के पुनर्जीवन की मांग करने वाले लोग बैराज और अविरल जलप्रवाह की बात कर रहे हैं, मगर सवाल यह है कि इन मांगों की गूंज आखिर जिम्मेदारों के दरवाजे तक कब पहुंचेगी?
गुरुजी ने झुनझुना बजाते हुए कहा, “नेताजी! जनता को भाषणों की लोरी नहीं, यमुना में बहता पानी चाहिए। चुनावी वादों की मिठाई नहीं, नदी की सफाई चाहिए। फोटो खिंचवाने के लिए घाट पर आना आसान है, लेकिन नदी को जीवित रखने के लिए जिम्मेदारी निभाना असली परीक्षा है।”
और फिर सेंटी गुरु ने झुनझुना उठाकर आखिरी चोट की- “आगरा को क्या मिला? झुनझुना! मगर याद रखिए, यह झुनझुना जितना छोटा दिखता है, इसकी आवाज उतनी ही बड़ी हो सकती है। जब जनता इसे बजाना सीख जाती है, तब सत्ता के दरवाजे भी खड़कने लगते हैं।”
अब देखना यह है कि यमुना की पुकार पर जिम्मेदार जागते हैं या झुनझुना बजाने वालों को ही शोर मचाने वाला बताकर आगे बढ़ जाते हैं।
- सेंटी गुरु…







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