3 नवंबर, 2026  |  06:38 IST
Jila Nazar
मंगलवार, 3 नवंबर 2026
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नागरिकता का प्रमाणपत्र या दादा की धुँधली यादें?

विकास भारद्वाज... ✍️

⏱ 1 मिनट में पढ़ें👁 5 बार पढ़ा गया
नागरिकता का प्रमाणपत्र या दादा की धुँधली यादें?

लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत नागरिक का विश्वास है। यह विश्वास तब डगमगाने लगता है, जब अपने ही देश में रहने वाला व्यक्ति अपनी नागरिकता साबित करने के लिए दादा की जन्मतिथि और पुरखों के दस्तावेज खोजने को विवश हो जाए।

मतदाता सूची की शुद्धता आवश्यक है। मृतकों के नाम हटने चाहिए, दोहरे पंजीकरण समाप्त होने चाहिए और फर्जी प्रविष्टियों पर कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन एक प्रतिशत नाम संदिग्ध होने की आशंका में शेष निन्यानवे प्रतिशत नागरिकों को भी संदेह के कठघरे में खड़ा कर देना किस न्याय का परिचायक है?

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इस देश में करोड़ों लोगों का जीवन कागजों से नहीं, स्मृतियों और अनुभवों से दर्ज हुआ है। किसी के पिता की जन्मतिथि स्कूल के रजिस्टर से तय हुई, किसी के दादा का जन्म प्रमाणपत्र कभी बना ही नहीं। प्रवासी मजदूर, किराएदार और विवाह के बाद घर बदलने वाली महिलाएं आज भी दस्तावेजों की विसंगतियों से जूझते हैं। क्या इन कमियों के कारण उनकी भारतीयता पर प्रश्नचिह्न लगाया जा सकता है?

व्यवस्था के पास अधिकारी हैं, अभिलेख हैं, तकनीक है और जाँच के अधिकार हैं। नागरिक के पास अक्सर एक पुराना राशन कार्ड और परिवार की धुँधली यादें। ऐसे में प्रमाण जुटाने का पूरा भार नागरिक पर डाल देना न्याय की भावना के विपरीत है। संदेह की जाँच व्यवस्था करे, निर्दोषता का प्रमाण नागरिक से न माँगे।

मतदाता सूची तैयार करना निर्वाचन आयोग का दायित्व है, लेकिन नागरिकता का निर्धारण एक अलग संवैधानिक प्रक्रिया है। दोनों के बीच की सीमा धुँधली होने लगे, तो लोकतंत्र की बुनियाद पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।

सबसे अधिक चिंता उन लोगों की होनी चाहिए, जिनकी आवाज सबसे कमजोर है। जिस मजदूर के पास रहने का स्थायी पता नहीं, जिस बुजुर्ग के दस्तावेजों में नाम की वर्तनी अलग है, जिस महिला ने विवाह के बाद कई बार अपना निवास बदला है  उनकी नागरिकता कागजों की भूलभुलैया में खोनी नहीं चाहिए।

डॉ. भीमराव आंबेडकर ने वयस्क मताधिकार को लोकतंत्र की आधारशिला माना था। मतदान का अधिकार केवल एक राजनीतिक सुविधा नहीं, बल्कि नागरिक की गरिमा का प्रतीक है।

आज आवश्यकता ऐसी व्यवस्था की है, जो संदिग्ध प्रविष्टियों की निष्पक्ष जाँच करे, प्रत्येक प्रभावित व्यक्ति को नोटिस और सुनवाई का अवसर दे तथा किसी निर्दोष का नाम मनमाने ढंग से न काटे।

लोकतंत्र में नागरिक व्यवस्था के सामने निहत्था नहीं होना चाहिए। सवाल केवल मतदाता सूची का नहीं, उस भरोसे का है जिस पर पूरा गणतंत्र खड़ा है।

जिस देश की मिट्टी में पुरखों की जड़ें हों, वहाँ उनकी नागरिकता का प्रमाण केवल कागजों में कैसे खोजा जा सकता है?

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