उत्तर प्रदेश की राजनीति में भाजपा की सबसे बड़ी शक्ति उसका समर्पित कार्यकर्ता रहा है। वह कार्यकर्ता, जिसने सीमित संसाधनों के बावजूद पार्टी के विचारों को जन-जन तक पहुंचाया, चुनावी संघर्षों में अपना सर्वस्व लगाया और संगठन को सत्ता के शिखर तक पहुंचाने में निर्णायक भूमिका निभाई। किंतु आज उसी कार्यकर्ता के राजनीतिक अवमूल्यन का प्रश्न पार्टी के भविष्य पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
विगत दस वर्षों में सत्ता के गलियारों से निकले कुछ वक्तव्यों ने संगठन और कार्यकर्ता के बीच अविश्वास की खाई को गहरा किया है। थाने, तहसील, ब्लॉक अथवा नगर निकायों में जनता के काम कराने जाने वाले कार्यकर्ताओं को दलाली की संज्ञा देना आखिर किस राजनीतिक विवेक का परिचायक है? जनता की समस्याओं से विमुख होकर कोई कार्यकर्ता अपने सामाजिक दायित्व का निर्वहन कैसे करेगा? और यदि वह अपने आसपास के लोगों के सुख-दुःख में सहभागी ही नहीं होगा, तो संगठन के प्रति उनकी निष्ठा कैसे अर्जित करेगा?
राजनीति केवल चुनावी सभाओं, नारों और डिजिटल अभियानों का नाम नहीं है। उसकी वास्तविक शक्ति समाज के बीच अर्जित विश्वास में निहित होती है। कार्यकर्ता जब किसी नागरिक की समस्या के समाधान के लिए प्रशासनिक कार्यालयों के चक्कर लगाता है, तब वह केवल एक व्यक्ति का काम नहीं कराता, बल्कि संगठन और समाज के बीच विश्वास का सेतु निर्मित करता है। इस भूमिका को संदेह की दृष्टि से देखना संगठन की जड़ों को कमजोर करना है।
यह भी विचारणीय है कि कार्यकर्ताओं को प्रशासनिक हस्तक्षेप से दूर रखने की नीति का प्रभाव सरकारी कार्यालयों में आम नागरिक की स्थिति पर क्या पड़ता है। यदि भ्रष्टाचार और अनियमितताओं पर अंकुश लगाना उद्देश्य है, तो उसके लिए पारदर्शी व्यवस्था और जवाबदेही आवश्यक है, न कि जनसेवा में सक्रिय कार्यकर्ताओं का सामूहिक अवमूल्यन।
भाजपा की राजनीतिक यात्रा में उस कार्यकर्ता का योगदान असंदिग्ध है, जिसने कठिन परिस्थितियों में भी संगठन का ध्वज थामे रखा। आज यदि वही कार्यकर्ता उपेक्षा और निराशा से सार्वजनिक जीवन के नेपथ्य में चला गया है, तो यह केवल संगठनात्मक समस्या नहीं, बल्कि राजनीतिक दूरदृष्टि की विफलता है।
सत्ता परिवर्तन से सरकारें बनती हैं, किंतु जनविश्वास से संगठन जीवित रहते हैं। भाजपा नेतृत्व को समझना होगा कि कार्यकर्ता कोई चुनावी मशीन का पुर्जा नहीं, बल्कि संगठन की आत्मा है। जिस दिन यह आत्मा निष्क्रिय हो जाएगी, उस दिन सत्ता की चमक भी राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित नहीं रख सकेगी।
- सन्त कुमार भारद्वाज







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