राजनीति से परिवार तक, अनियोजित फैसलों का बोझ समाज पर, समाधान की जगह नई समस्याएं पैदा करने की आदत कब बदलेगी?
समाज की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि समस्याएं पैदा करने में जितनी तत्परता दिखाई जाती है, उन्हें सुलझाने में उतनी ही सुस्ती बरती जाती है। एक समस्या अभी पूरी तरह खत्म भी नहीं होती कि दूसरी सिर उठाकर खड़ी हो जाती है। ऐसा लगता है मानो समस्या की मां ने भी फैमिली प्लानिंग न अपनाने की कसम खा रखी हो। यह व्यंग्य केवल परिवार तक सीमित नहीं, बल्कि हमारी राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक व्यवस्था पर भी सटीक बैठता है।
राजनीति को ही देख लीजिए। बेरोजगारी का सवाल उठता है तो उसके जवाब में नए वादों की फेहरिस्त सामने आ जाती है। महंगाई से जनता परेशान होती है तो बहस किसी दूसरे मुद्दे पर पहुंच जाती है। सड़क, बिजली, पानी और शिक्षा जैसी बुनियादी समस्याएं वर्षों तक समाधान की प्रतीक्षा करती रहती हैं, लेकिन उनके बीच नई घोषणाओं और नए विवादों का जन्म होता रहता है। सवाल यह है कि समस्याओं का स्थायी समाधान प्राथमिकता क्यों नहीं बनता?
सामाजिक जीवन में भी यही तस्वीर है। जातिवाद, भेदभाव, नशाखोरी, दहेज और दिखावे की प्रतिस्पर्धा जैसी बुराइयां समाज को कमजोर कर रही हैं। एक पीढ़ी इनसे जूझती है तो अगली पीढ़ी के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो जाती हैं। हम बच्चों को अच्छे संस्कार देने की बात तो करते हैं, लेकिन अपने व्यवहार से उन्हें क्या सिखा रहे हैं, इस पर आत्ममंथन करने को तैयार नहीं होते।
परिवार भी इस अव्यवस्था से अछूता नहीं है। घरों में संवाद की कमी, रिश्तों में अविश्वास, आर्थिक दबाव और जिम्मेदारियों से बचने की प्रवृत्ति छोटी-छोटी बातों को बड़े विवाद में बदल देती है। जहां समझदारी से एक समस्या सुलझ सकती है, वहां अहंकार और जिद नई समस्याओं की पूरी कतार खड़ी कर देते हैं।
दरअसल, समस्या का बढ़ना उतना खतरनाक नहीं, जितना समाधान के प्रति हमारी उदासीनता। राजनीति में जवाबदेही, समाज में जागरूकता और परिवार में संवाद की संस्कृति विकसित करनी होगी।
आखिर समस्या की मां को भी समझना होगा कि हर नई समस्या को जन्म देना कोई उपलब्धि नहीं है। असली समझदारी तो समस्याओं की संख्या बढ़ाने में नहीं, बल्कि उन्हें जड़ से खत्म करने में है।
क्योंकि जिंदगी समस्याओं को पालने के लिए नहीं, समाधान तलाशने के लिए मिली है। एक समस्या का समाधान अगली समस्या के जन्म पर लगाम लगा सकता है। यही स्वस्थ राजनीति, सभ्य समाज और सुखी परिवार की असली पहचान है।
• सन्त कुमार भारद्वाज







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