दीपावली आ गई है। बाजारों में रौनक है, घरों में सजावट है, मिठाइयों की खुशबू है और आसमान में आतिशबाजी की तैयारी। हर तरफ रोशनी का इंतजाम है, लेकिन इसी चमक-दमक के बीच एक ऐसा घर भी है, जहां अंधेरा केवल रात का नहीं, बल्कि जिंदगी का है। उस घर में एक गरीब कुम्हार बैठा है, जिसके मिट्टी के दीपक तो तैयार हैं, मगर खरीददार गायब हैं।
सेंटी गुरु के हाथ मिट्टी का एक दीपक, चेहरे पर उदासी और जुबान पर व्यंग्य की मिठास। बोले, “भाइयो! दीपावली में लक्ष्मी जी के स्वागत की तैयारी है, मगर जरा उस कुम्हार का भी हाल पूछ लो, जिसने महीनों मेहनत करके मिट्टी को दीया बनाया और अब अपनी बिटिया की आंखों में खुशी का उजाला तलाश रहा है।”
कुम्हार की पीड़ा सुनिए। महीने भर मिट्टी जुटाई, चाक चलाया, दीपक बनाए, उपले इकट्ठे किए और तीन दिन तक उन्हें तपाया। कुछ भट्ठे में टूट गए, कुछ रास्ते में बिखर गए और कुछ बाजार की बेरुखी की भेंट चढ़ गए। जो बचे हैं, वे अब खरीददारों की राह देख रहे हैं।
बिटिया ने पापा से बस इतना कहा था—लड्डू लेकर आना, चार फुलझड़ियां भी। मगर पिता की जेब में पैसे नहीं, आंखों में बेबसी है। वह बेटी को क्या समझाए कि दीपावली के बाजार में रोशनी तो बिक रही है, लेकिन उसके घर का उजाला खरीदने वाला कोई नहीं?
सेंटी गुरु फिर बोले, “वाह रे विकास! एक तरफ करोड़ों की सजावट, दूसरी तरफ सौ रुपये में सौ दीये बेचने को मजबूर कुम्हार। बाजार में चमक बढ़ रही है, मगर मेहनतकश की जिंदगी का दीया टिमटिमा रहा है।”
यह सवाल किसी एक कुम्हार का नहीं, हमारी संवेदना का है। हम मिट्टी के दीये खरीदकर परंपरा बचाने की बात तो करते हैं, लेकिन क्या उस हाथ की मेहनत का सम्मान भी करते हैं, जिसने उन्हें बनाया?
दीपावली पर घर रोशन करना अच्छी बात है, मगर किसी की उम्मीद बुझाकर अपने घर में उजाला करना कैसी खुशहाली?
इस बार मिठाई के डिब्बे के साथ मिट्टी के दीये भी खरीदिए। उस कुम्हार से मोलभाव मत कीजिए, जिसकी मेहनत पहले ही बाजार की बेरुखी से टूट चुकी है।
क्योंकि दीपावली की असली रोशनी बिजली के झालरों में नहीं, किसी गरीब की आंखों में चमकती उम्मीद में है।
सेंटी गुरु की आखिरी बात याद रखिए—जिस दीपावली में गरीब के घर का दीया न जले, उस दीपावली की रोशनी अधूरी है।
सेंटी गुरु…







टिप्पणियाँ
इस खबर पर सबसे पहले अपनी टिप्पणी करें।