उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के साथ सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अयोध्या से चुनाव लड़ने की चुनौती दी थी, लेकिन अब खुद विधानसभा चुनाव नहीं लड़ने का ऐलान कर दिया है। वाराणसी में तीन नवंबर को उन्होंने कहा कि वह चुनाव लड़ने नहीं, सीधे मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने आएंगे। उनके इस बयान ने भाजपा को हमले का मौका दे दिया है। सवाल उठ रहा है कि जो नेता दूसरे की लोकप्रियता को चुनावी मैदान में परखना चाहता है, वह खुद मैदान से बाहर क्यों रहना चाहता है?
अखिलेश के इस फैसले को भाजपा ने ‘रणछोड़’ की राजनीति करार दिया है। लेकिन राजनीति में किसी को तमगा दे देना आसान है, उसे जनता की अदालत में साबित करना मुश्किल। अखिलेश चुनाव लड़ें या न लड़ें, उनकी असली परीक्षा सपा को बहुमत दिलाने की होगी। 2022 में सपा 111 सीटों पर सिमट गई थी, जबकि बहुमत के लिए 202 सीटें जरूरी हैं। यानी मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने के लिए पार्टी को अभी लंबा रास्ता तय करना है।
अखिलेश का तर्क है कि मुख्यमंत्री बनने के लिए विधानसभा चुनाव लड़ना अनिवार्य नहीं। 2012 में वह सांसद रहते मुख्यमंत्री बने थे। यह संवैधानिक रूप से संभव है, लेकिन उस समय सपा के पास 224 विधायकों का स्पष्ट बहुमत था। आज परिस्थितियां अलग हैं। केवल मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने की घोषणा से सरकार नहीं बनती। जनता का समर्थन और विधायकों का बहुमत ही सत्ता का रास्ता खोलता है।
दूसरी ओर, भाजपा को भी यह नहीं भूलना चाहिए कि सत्ता का ‘अंगद का पैर’ हमेशा के लिए नहीं जमता। 2017 में भाजपा ने 312 सीटें जीती थीं, लेकिन 2022 में उसकी सीटें घटकर 255 रह गईं। सपा 47 से बढ़कर 111 तक पहुंची। 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने 37 सीटें जीतकर भाजपा को 33 पर रोक दिया। ये आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में मतदाता किसी भी दल को स्थायी सत्ता का पट्टा नहीं देता।
अखिलेश के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने पक्ष में बने राजनीतिक माहौल को विधानसभा की सीटों में बदलने की है। रोजगार, किसानों की समस्याएं, भर्ती परीक्षाओं की पारदर्शिता, महंगाई और स्वास्थ्य सेवाओं जैसे मुद्दों पर सपा को स्पष्ट कार्ययोजना देनी होगी। केवल भाजपा विरोध या पीडीए का नारा सत्ता की गारंटी नहीं बन सकता।
इसी तरह भाजपा को भी विकास के दावों के साथ रोजगार, निवेश और किसानों की आय पर ठोस जवाब देना होगा। एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट और औद्योगिक निवेश के दावों के बीच जनता यह जानना चाहेगी कि कितनी परियोजनाएं जमीन पर उतरीं और कितने युवाओं को स्थायी रोजगार मिला।
अखिलेश का चुनाव न लड़ने का फैसला उनकी राजनीतिक रणनीति भी हो सकता है। वह पूरे प्रदेश में प्रचार कर सपा को बहुमत दिलाने की कोशिश कर सकते हैं। लेकिन यदि पार्टी बहुमत से दूर रह गई तो मुख्यमंत्री पद की उनकी घोषणा सवालों के घेरे में होगी। दूसरी ओर, भाजपा भी विकास के नाम पर जनता की नाराजगी को अनदेखा नहीं कर सकती।
2027 का चुनाव दोनों नेताओं के लिए अग्निपरीक्षा होगा। अखिलेश को साबित करना है कि चुनाव न लड़कर भी वह बहुमत दिला सकते हैं, जबकि योगी को यह दिखाना होगा कि सत्ता में बने रहने का आधार केवल प्रचार नहीं, जनता का भरोसा है। अंततः न ‘रणछोड़’ का तमगा चलेगा, न ‘अंगद का पैर’, जनता के फैसले के सामने दोनों को अपना हिसाब देना पड़ेगा।







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