4 नवंबर, 2026  |  01:06 IST
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कार्यकर्ताओं की नाराजगी से ‘हिला’ बीजेपी आलाकमान

संजय सक्सेना, वरिष्ठ पत्रकार... ✍️

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कार्यकर्ताओं की नाराजगी से ‘हिला’ बीजेपी आलाकमान

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही प्रदेश की सियासत में हलचल तेज हो गई है। भाजपा ने भी अपनी चुनावी तैयारियों को धार देना शुरू कर दिया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के लगातार दौरे और संगठन के साथ बैठकों से साफ है कि पार्टी आगामी चुनाव को लेकर कोई जोखिम नहीं उठाना चाहती। लेकिन इस बार भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्षी दलों से ज्यादा अपने ही कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर करने की है।

भाजपा की चुनावी ताकत हमेशा से उसका जमीनी संगठन रहा है। बूथ स्तर पर सक्रिय कार्यकर्ता ही पार्टी की नीतियों और सरकार के कामकाज को जनता तक पहुंचाते हैं। मगर बीते कुछ समय से संगठन के भीतर असंतोष की चर्चाएं तेज हुई हैं। पुराने और समर्पित कार्यकर्ताओं की शिकायत है कि सत्ता और संगठन में उनकी भूमिका सीमित होती जा रही है। नौकरशाही के बढ़ते प्रभाव और निर्णय प्रक्रिया में उनकी अनदेखी ने कार्यकर्ताओं के मनोबल को प्रभावित किया है। यही वजह है कि कई स्थानों पर संगठनात्मक गतिविधियों में अपेक्षित उत्साह दिखाई नहीं दे रहा।

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अमित शाह ने इसी नाराजगी को भांपते हुए लखनऊ में आयोजित भाजपा कार्यसमिति की बैठक और कार्यकर्ता सम्मेलन में सीधे संवाद का रास्ता अपनाया। उन्होंने कार्यकर्ताओं से अपनी नाराजगी और शिकायतें गोमती नदी में बहाकर एकजुट होने की अपील की। उनका संदेश स्पष्ट था कि आपसी मतभेद भुलाकर पार्टी को तीसरी बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने के लक्ष्य के लिए जुटना होगा।

यह अपील भाजपा की आंतरिक स्थिति पर कई सवाल भी खड़े करती है। कभी उत्तर प्रदेश में पार्टी की सरकार को अंगद के पांव की तरह अडिग बताने वाले अमित शाह को अब कार्यकर्ताओं से नाराजगी छोड़ने की गुहार लगानी पड़ रही है। यह बदलाव बताता है कि चुनावी रणनीति में केवल आत्मविश्वास और बड़े नेताओं की लोकप्रियता पर्याप्त नहीं है। संगठन की एकजुटता और कार्यकर्ताओं का भरोसा भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

भाजपा की चुनावी रणनीति में बूथ प्रबंधन, नए मतदाताओं को जोड़ने और कमजोर क्षेत्रों में संगठन को मजबूत करने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। साथ ही समान नागरिक संहिता, राष्ट्रवाद, विकास और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों को चुनावी विमर्श के केंद्र में रखने की तैयारी है। पार्टी का प्रयास है कि जातिगत समीकरणों के बीच अपनी वैचारिक पहचान और उपलब्धियों के सहारे मतदाताओं को एकजुट रखा जाए।

हालांकि, इन रणनीतियों की सफलता काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि पार्टी अपने नाराज कार्यकर्ताओं को कितना संतुष्ट कर पाती है। चुनावी लक्ष्य निर्धारित करना आसान है, लेकिन उसे जमीन पर उतारने के लिए संगठन का सक्रिय और संतुष्ट होना जरूरी है।

अमित शाह की अपील भाजपा की चुनावी गंभीरता के साथ-साथ संगठन के भीतर मौजूद चुनौतियों का भी संकेत देती है। कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर करना अब पार्टी के लिए केवल संगठनात्मक सुधार का विषय नहीं, बल्कि चुनावी सफलता की अनिवार्य शर्त बन गया है।

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