4 नवंबर, 2026  |  01:09 IST
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डिग्रियों का सम्मान और लोकतंत्र की जवाबदेही

संपादकीय..... ✍️

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डिग्रियों का सम्मान और लोकतंत्र की जवाबदेही

लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि यहां सत्ता जनता से जन्म लेती है और जनता के प्रति ही जवाबदेह होती है। लेकिन जब अधिकारों की मांग करने वाले युवाओं को अपनी बात कहने के लिए संघर्ष करना पड़े, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या लोकतंत्र में असहमति की जगह लगातार संकुचित होती जा रही है?

यूजीसी के नियमों को लेकर उठे विवाद और सामान्य वर्ग के युवाओं की चिंताओं के बीच यह प्रश्न केवल किसी एक वर्ग की मांग तक सीमित नहीं रह जाता। यह समान अवसर, संवैधानिक अधिकार और शासन की निष्पक्षता से जुड़ा व्यापक मुद्दा बन जाता है।

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सामान्य वर्ग के युवाओं का एक बड़ा हिस्सा लंबे समय से यह महसूस करता रहा है कि उसकी समस्याओं और अपेक्षाओं को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी, रोजगार की अनिश्चितता और भविष्य को लेकर बढ़ती चिंता के बीच जब युवा अपनी मांगों के साथ सड़कों पर उतरते हैं, तो उनकी आवाज को गंभीरता से सुना जाना चाहिए।

यह भी उतना ही आवश्यक है कि किसी भी वर्ग की मांग को दूसरे वर्ग के अधिकारों के विरुद्ध खड़ा न किया जाए। सामाजिक न्याय और समान अवसर एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के पूरक हैं। किसी नीति पर असहमति रखने का अधिकार सभी नागरिकों को है, लेकिन उसका समाधान संवाद, संवैधानिक प्रक्रिया और तथ्यों के आधार पर ही संभव है।

यदि प्रदर्शन के दौरान युवाओं के साथ दुर्व्यवहार या अनावश्यक बल प्रयोग होता है, तो यह प्रशासनिक संवेदनशीलता और लोकतांत्रिक मर्यादा पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। कानून-व्यवस्था बनाए रखना सरकार का दायित्व है, लेकिन शांतिपूर्ण विरोध को सम्मान देना भी उसी जिम्मेदारी का हिस्सा है।

सत्ता को यह समझना होगा कि जनता केवल चुनाव के समय महत्वपूर्ण नहीं होती। उसका महत्व चुनाव के बाद भी उतना ही बना रहता है। वोट मांगते समय हाथ जोड़ना और सवाल पूछने पर असहज हो जाना लोकतांत्रिक विश्वास को कमजोर करता है।

आज आवश्यकता किसी वर्ग को दूसरे के विरुद्ध खड़ा करने की नहीं, बल्कि सभी के लिए न्यायपूर्ण व्यवस्था सुनिश्चित करने की है। सरकार को युवाओं की शिकायतें सुननी चाहिए, नीतियों पर पारदर्शी संवाद करना चाहिए और जहां अन्याय हुआ हो, वहां निष्पक्ष कार्रवाई करनी चाहिए।

लोकतंत्र में सवाल पूछना बगावत नहीं, नागरिक होने का अधिकार है। सत्ता की वास्तविक शक्ति विरोध की आवाज दबाने में नहीं, बल्कि उसे सुनकर न्यायपूर्ण समाधान देने में निहित है।

• सन्त कुमार भारद्वाज…✍️

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