अरे भाई! सेंटी गुरु की एंट्री हो चुकी है। जरा कलम संभालकर बैठिए, क्योंकि आज बात खबर लिखने वालों की नहीं, खबरों के नाम पर दरबारी बनने वालों की है।
वाह री पत्रकारिता! कुछ लोगों ने तो पत्रकारिता को ऐसा नया रूप दे दिया है कि खबरों से ज्यादा अधिकारियों की तारीफ छपती है और जनसमस्याओं से ज्यादा साहब की शान में कसीदे पढ़े जाते हैं। कलम जनता की आवाज बनने के बजाय कुछ लोगों के लिए अधिकारियों की कृपा पाने का औजार बनती जा रही है।
सेंटी गुरु पूछते हैं कि आखिर पत्रकारिता का धर्म क्या है? जनता की परेशानी को सामने लाना या अधिकारियों की नाराजगी से बचते हुए उनकी हर बात पर तालियां बजाना? अगर पत्रकार का काम सिर्फ अधिकारी की तारीफ करना, उसके इशारों पर चलना और दूसरे पत्रकारों के सामने अपनी नजदीकियों का रौब झाड़ना रह गया है, तो फिर पत्रकारिता और चापलूसी में फर्क ही क्या बचा?
और तो और, कोई दूसरा पत्रकार सम्मानपूर्वक किसी अधिकारी से जानकारी लेने के लिए फोन कर ले तो कुछ महानुभावों के तेवर ऐसे चढ़ जाते हैं, मानो पत्रकारिता का ठेका उन्हीं के नाम लिख दिया गया हो। अरे जनाब! अधिकारी किसी की निजी जागीर नहीं और सूचना मांगना कोई अपराध नहीं है। दूसरे पत्रकार से अभद्रता करना आपकी प्रतिष्ठा नहीं, आपकी सोच का परिचय देता है।
सेंटी गुरु की बात गांठ बांध लीजिए-पत्रकारिता में प्रतिस्पर्धा खबरों की गुणवत्ता पर होनी चाहिए, अधिकारियों से नजदीकी दिखाने पर नहीं। किसी अधिकारी से अच्छे संबंध होना गलत नहीं, लेकिन उन संबंधों के कारण पत्रकारिता की निष्पक्षता गिरवी रख देना जरूर गलत है।
याद रखिए, अधिकारी आते-जाते रहेंगे, कुर्सियां बदलती रहेंगी, लेकिन पत्रकारिता की विश्वसनीयता एक बार टूट गई तो उसे जोड़ना आसान नहीं होगा।
इसलिए कलम को दरबार का गुलाम मत बनाइए। पत्रकार बनिए, दरबारी नहीं। सवाल पूछिए, सच दिखाइए और साथी पत्रकारों का सम्मान करना सीखिए। क्योंकि जिस दिन पत्रकार ही पत्रकार का सम्मान करना भूल जाएगा, उस दिन पत्रकारिता की ताकत कमजोर करने के लिए किसी दुश्मन की जरूरत नहीं पड़ेगी।
— सेंटी गुरु

















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