6 नवंबर, 2026  |  06:09 IST
Jila Nazar
शुक्रवार, 6 नवंबर 2026
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दीवाली के दीये और वेतन को तरसते हाथ

- सेंटी गुरु का तंजनामा... ✍️

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दीवाली के दीये और वेतन को तरसते हाथ

दीवाली का त्योहार है। बाजारों में रोशनी है, घरों में मिठाइयां हैं, चेहरों पर मुस्कान है और हर तरफ खुशियां बांटने का शोर है। मगर एक नामचीन प्रतिष्ठान के कुछ कर्मचारियों के लिए यह दीवाली भी सवाल बनकर खड़ी है। सवाल वेतन का, सम्मान का और उस इंसानियत का, जिसकी सबसे ज्यादा जरूरत त्योहारों पर होती है।

सेंटी गुरु के हाथ में कलम, चेहरे पर गंभीरता और आंखों में उन कर्मचारियों का दर्द, जिनके लिए दीवाली के दीये तो जल गए, मगर जिंदगी के अंधेरे कम नहीं हुए।

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सेंटी गुरु कहते हैं, वाह रे ब्रांडेड प्रतिष्ठान के मालिक! नाम आपका चमकदार, कारोबार शानदार और प्रचार दमदार, लेकिन आपके यहां काम करने वाले छोटे कर्मचारियों की जेब खाली। वेतन को तरसते हाथ, त्योहार की खरीदारी को मोहताज परिवार और बच्चों की आंखों में दीवाली के उपहारों का इंतजार।

दीवाली गिफ्ट बांटने की रस्म भी खूब निभाई गई। मगर कमाल देखिए, जिन कर्मचारियों को समय पर वेतन नहीं मिला, उन्हीं के हाथों से दूसरे कर्मचारियों को गिफ्ट बंटवा दिए गए। मानो जिम्मेदारी भी पूरी हो गई और संवेदना का प्रमाणपत्र भी मिल गया।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। कुछ कर्मचारियों ने आपस में ही दीवाली गिफ्ट बांटकर अपनी छोटी-छोटी खुशियां साझा कर लीं। किसी ने किसी को मिठाई दी, किसी ने किसी के चेहरे पर मुस्कान लाने की कोशिश की। अपनी जेब से नहीं, अपने छोटे-छोटे दिलों से उन्होंने त्योहार मनाया।

और उधर, अपने आपको मालिक समझने वाला बॉस यह सब देखता रहा। न शर्म आई, न संकोच हुआ, न किसी की मजबूरी ने मन को झकझोरा। शायद उसे लगा होगा कि गिफ्ट बंट गए, दीवाली मन गई और प्रतिष्ठान की साख भी बच गई।

सेंटी गुरु का सवाल है कि आखिर किस बात की ब्रांडिंग है यह? बड़ी इमारतें, चमकदार विज्ञापन और ऊंचे पद तो किसी भी प्रतिष्ठान की पहचान हो सकते हैं, लेकिन क्या उसकी असली पहचान उन हाथों से नहीं बनती, जो दिन-रात मेहनत करके उसे आगे बढ़ाते हैं? क्या मेहनत करने वाले हाथों की कोई कीमत नहीं?

याद रखिए, कर्मचारी कोई मशीन नहीं, इंसान हैं। उनके घरों में भी बच्चे हैं, बुजुर्ग हैं, जरूरतें हैं और त्योहार हैं। वेतन उनका एहसान नहीं, अधिकार है। गिफ्ट उनकी मेहनत का विकल्प नहीं हो सकता।

सेंटी गुरु अंत में बस इतना कहते हैं—दीवाली के दीये तो हर साल जल जाएंगे, मगर जिन घरों में वेतन की जगह इंतजार रखा हो, वहां खुशियों की लौ कैसे जलेगी?

आखिर कैसे मनेगी उन कर्मचारियों की दीवाली, जिनके हाथों में दूसरों की खुशियां बांटने की जिम्मेदारी है, लेकिन अपने घर के चूल्हे की चिंता से वे खुद ही घिरे हैं?

  - सेंटी गुरु…

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