अमेरिका के मिशिगन में अब्दुल अल-सयद की जीत ने हजारों किलोमीटर दूर उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने इस जीत को मुस्लिम राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जोड़ते हुए कहा कि अब ‘अब्दुल’ दूसरों के लिए दरी नहीं बिछाएगा, बल्कि खुद नेता और विधायक बनेगा। उनका नारा सियासी तौर पर असरदार है, लेकिन सवाल है कि क्या यह असंतोष अखिलेश यादव के मुस्लिम-यादव समीकरण को कमजोर कर पाएगा?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुस्लिम मतदाताओं का महत्व किसी से छिपा नहीं है। समाजवादी पार्टी लंबे समय से इस समर्थन को अपनी चुनावी ताकत मानती रही है। अखिलेश यादव ने पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक यानी पीडीए के जरिए अपने सामाजिक आधार को व्यापक बनाने की कोशिश की है। मगर ओवैसी का सवाल इसी गठबंधन के भीतर प्रतिनिधित्व और हिस्सेदारी को लेकर है।
ओवैसी का आरोप है कि मुस्लिम समाज को चुनावों में वोट और भीड़ की तरह इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन नेतृत्व और फैसलों में बराबर जगह नहीं मिलती। यह शिकायत नई नहीं है। मुस्लिम समाज के भीतर भी राजनीतिक हिस्सेदारी को लेकर अलग-अलग विचार हैं। कोई भाजपा को चुनौती देने वाली मजबूत पार्टी के साथ रहना चाहता है, तो कोई अपने समुदाय के स्वतंत्र नेतृत्व की जरूरत महसूस करता है।
लेकिन ओवैसी के लिए राह आसान नहीं है। 2022 के विधानसभा चुनाव में एआईएमआईएम ने करीब 95 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, लेकिन एक भी सीट नहीं जीत सकी। इससे साफ है कि केवल नारों और सभाओं से चुनावी जमीन तैयार नहीं होती। बूथ स्तर का संगठन, स्थानीय चेहरे और जनता के मुद्दों पर भरोसेमंद काम जरूरी है।
दूसरी ओर अखिलेश यादव के सामने भी चुनौती कम नहीं। उन्हें मुस्लिम मतदाताओं का भरोसा बनाए रखने के साथ पिछड़े और दलित वर्गों को भी साथ रखना है। यदि टिकट वितरण, संगठन और निर्णय प्रक्रिया में मुस्लिम नेताओं की भूमिका सीमित दिखाई देती है, तो ओवैसी का सवाल और धार पकड़ सकता है।
हालांकि मुस्लिम मतदाताओं को एकमुश्त वोट बैंक मानना भी राजनीतिक भूल होगी। उनकी प्राथमिकताएं क्षेत्र, उम्मीदवार, गठबंधन और स्थानीय समस्याओं के अनुसार बदलती हैं। शिक्षा, रोजगार, सुरक्षा और महंगाई जैसे मुद्दे भी उनके फैसलों को प्रभावित करते हैं।
ओवैसी के लिए सबसे बड़ी परीक्षा यही होगी कि वे प्रतिनिधित्व की मांग को वास्तविक चुनावी सफलता में कैसे बदलते हैं। केवल सपा के वोट काटना उनकी राजनीतिक उपलब्धि नहीं हो सकती। उन्हें यह भी दिखाना होगा कि उनकी पार्टी जीतने योग्य उम्मीदवार और प्रभावी संगठन खड़ा कर सकती है।
2027 का विधानसभा चुनाव इस बहस की असली परीक्षा बनेगा। अखिलेश को अपने गठबंधन में हिस्सेदारी का भरोसा मजबूत करना होगा, जबकि ओवैसी को नारे से आगे बढ़कर जमीन पर अपनी ताकत साबित करनी होगी।
मिशिगन ने संभावना दिखाई है, लेकिन उत्तर प्रदेश में उसका अर्थ मतदाता तय करेंगे।







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