7 नवंबर, 2026  |  16:00 IST
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दीपोत्सव : धार्मिक आस्था, राजनीतिक विमर्श और आम आदमी की दिवाली

संपादकीय :

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दीपोत्सव : धार्मिक आस्था, राजनीतिक विमर्श और आम आदमी की दिवाली

दीपावली केवल दीपों की जगमगाहट, लक्ष्मी-गणेश की आराधना और मिठाइयों की मिठास का पर्व नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज की सांस्कृतिक चेतना, धार्मिक आस्था और सामाजिक जीवन का जीवंत प्रतिबिंब भी है। पंचदिवसीय दीपोत्सव अपने साथ उत्साह, उल्लास और नई उम्मीदों का संदेश लेकर आता है। धनतेरस से भाई दूज तक चलने वाला यह पर्व जहां धार्मिक मान्यताओं को पुष्ट करता है, वहीं राजनीति और आम आदमी की जिंदगी के अनेक अनकहे सवालों को भी उजागर करता है।

धार्मिक दृष्टि से दीपोत्सव अंधकार पर प्रकाश, असत्य पर सत्य और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है। भगवान श्रीराम के अयोध्या आगमन की स्मृति हो अथवा माता लक्ष्मी की आराधना, प्रत्येक परंपरा मनुष्य को मर्यादा, सदाचार, समृद्धि और सद्भाव का संदेश देती है। भगवान श्रीकृष्ण की गोवर्धन लीला से लेकर भाई-बहन के स्नेह तक, इस पर्व का प्रत्येक दिन भारतीय संस्कृति की किसी न किसी सुंदर परंपरा से जुड़ा है।

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लेकिन इस उत्सवी उजास के बीच राजनीति का अपना अलग रंग भी दिखाई देता है। दीपावली के अवसर पर जनप्रतिनिधियों के शुभकामना संदेश, दीपोत्सव आयोजनों की भव्यता, विकास के दावे और जनसंपर्क की सक्रियता राजनीतिक परिदृश्य को भी रोशन करती है। सत्ता पक्ष उपलब्धियों का दीप जलाता है तो विपक्ष जनसमस्याओं के अंधकार की ओर ध्यान खींचता है। सवाल यह है कि उत्सव की चमक केवल मंचों, महलों और सरकारी आयोजनों तक सीमित रहेगी या उसकी रोशनी समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक भी पहुंचेगी?

आम आदमी की दिवाली का अर्थ केवल बाजारों की रौनक नहीं, बल्कि घर के चूल्हे की गर्माहट, बच्चों की मुस्कान, परिवार की खुशियां और जेब पर बोझ डाले बिना त्योहार मनाने की स्वतंत्रता है। महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक असमानता के बीच अनेक परिवार आज भी सीमित साधनों में दीप जलाने की जद्दोजहद करते हैं। उनके लिए दिवाली तभी सार्थक होगी, जब खुशियों के साथ जीवन में आर्थिक राहत और भविष्य की उम्मीद भी पहुंचे।

वास्तव में दीपोत्सव की सार्थकता दीपों की संख्या से नहीं, बल्कि उन घरों तक पहुंचने वाली रोशनी से मापी जानी चाहिए, जहां अभाव अब भी अंधेरा बनकर बैठा है। राजनीति का धर्म जनकल्याण और धर्म का मर्म मानवता है। यदि दोनों का उद्देश्य आम आदमी के जीवन में सुख, सम्मान और समृद्धि लाना बन जाए, तो यही पंचदिवसीय दीपोत्सव का सबसे बड़ा संदेश और सच्ची दिवाली होगी।

 सन्त कुमार भारद्वाज

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