7 नवंबर, 2026  |  16:00 IST
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नरक चतुर्दशी 2026: अंधकार पर प्रकाश की विजय का महापर्व, जानिए शुभ मुहूर्त, अभ्यंग स्नान और पूजा-विधि

पं. राजकिशोर शर्मा (राजगुरु महाराज)

⏱ 1 मिनट में पढ़ें👁 24 बार पढ़ा गया
नरक चतुर्दशी 2026: अंधकार पर प्रकाश की विजय का महापर्व, जानिए शुभ मुहूर्त, अभ्यंग स्नान और पूजा-विधि

पंचदिवसीय दीपोत्सव का दूसरा दिन नरक चतुर्दशी धार्मिक आस्था, पौराणिक मान्यताओं और आध्यात्मिक चेतना का अनूठा संगम है। इसे छोटी दिवाली, रूप चौदस, काली चौदस और यम दीपदान के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व केवल दीप जलाने और उत्सव मनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन से अज्ञान, अहंकार, भय और नकारात्मकता को दूर कर सकारात्मकता का प्रकाश फैलाने का संदेश भी देता है। धार्मिक मान्यता है कि इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने अत्याचारी नरकासुर का वध कर हजारों महिलाओं को उसके बंधन से मुक्त कराया था। इसी विजय की स्मृति में नरक चतुर्दशी मनाई जाती है।

पं. राजकिशोर शर्मा 

दीपावली से ठीक पहले आने वाला यह पर्व घर-परिवार की सुख-समृद्धि, आरोग्य, दीर्घायु और मंगलकामना से जुड़ा हुआ है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण, माता काली, हनुमान जी और यमराज की पूजा का विशेष विधान माना गया है। वहीं प्रातःकाल अभ्यंग स्नान और संध्याकाल यम दीपदान की परंपरा इस पर्व को विशिष्ट बनाती है।

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  -  नरकासुर वध की पौराणिक कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार प्राचीन काल में प्राग्ज्योतिषपुर का राजा नरकासुर अत्यंत शक्तिशाली और क्रूर असुर था। शक्ति और सामर्थ्य के मद में चूर होकर उसने देवताओं को परेशान करना शुरू कर दिया। उसने देवराज इंद्र के अधिकारों को चुनौती दी और हजारों महिलाओं को बंदी बना लिया। उसके अत्याचारों से धरती और देवलोक में त्राहि-त्राहि मच गई।

नरकासुर के आतंक से मुक्ति दिलाने के लिए देवताओं ने भगवान श्रीकृष्ण से प्रार्थना की। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ नरकासुर से युद्ध करने पहुंचे। भयंकर युद्ध के दौरान सत्यभामा ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और अंततः नरकासुर का अंत हुआ। भगवान श्रीकृष्ण ने उसकी कैद से हजारों महिलाओं को मुक्त कराया तथा संसार को उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाई।

मान्यता है कि नरकासुर के वध के बाद लोगों ने प्रसन्नता में दीप जलाकर उत्सव मनाया। तभी से यह दिन नरक चतुर्दशी के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। यह कथा संदेश देती है कि अन्याय, अत्याचार और अहंकार चाहे कितने ही शक्तिशाली क्यों न हों, अंततः सत्य और धर्म की विजय निश्चित है।

  -  नरक चतुर्दशी 2026: तिथि और शुभ मुहूर्त

वर्ष 2026 में नरक चतुर्दशी से संबंधित तिथि और पूजा के समय को लेकर पंचांग के अनुसार अनुष्ठान करना महत्वपूर्ण है। उपलब्ध कराए गए पंचांग विवरण के अनुसार चतुर्दशी तिथि 7 नवंबर 2026 को सुबह 10:47 बजे प्रारंभ होकर 8 नवंबर 2026 को सुबह 11:27 बजे समाप्त होगी।

प्रदोषकाल में चतुर्दशी की उपस्थिति के आधार पर छोटी दिवाली के दीपदान और रात्रिकालीन पूजा का विधान बताया गया है, जबकि अभ्यंग स्नान 8 नवंबर की सुबह किया जाएगा।

  - प्रमुख शुभ मुहूर्त

* हनुमान पूजा एवं काली पूजा: 7 नवंबर, रात्रि 11:39 से 12:31 बजे तक।

* अभ्यंग स्नान: 8 नवंबर, प्रातः 5:41 से 6:38 बजे तक।

* अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11:43 से दोपहर 12:26 बजे तक।

* विजय मुहूर्त: दोपहर 1:53 से 2:37 बजे तक।

* गोधूलि मुहूर्त: शाम 5:31 से 5:57 बजे तक।

* प्रदोषकाल: शाम 5:31 से रात 8:09 बजे तक।

 

  -  अभ्यंग स्नान: रूप चौदस पर क्यों है विशेष महत्व?

नरक चतुर्दशी को रूप चौदस के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन सूर्योदय से पूर्व अभ्यंग स्नान करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता है कि इस स्नान से व्यक्ति को आरोग्य, सौंदर्य, दीर्घायु और सकारात्मक ऊर्जा का आशीर्वाद प्राप्त होता है। इसे नरक के भय से मुक्ति और शारीरिक-मानसिक शुद्धि का प्रतीक भी माना जाता है।

अभ्यंग स्नान के लिए तिल का तेल, बेसन, हल्दी, चंदन और गुलाबजल से तैयार उबटन तथा अपामार्ग (चिरचिटा) का प्रयोग किया जाता है।

  - स्नान की सरल विधि

* प्रातःकाल निर्धारित मुहूर्त में उठकर शरीर पर तिल के तेल की हल्की मालिश करें।

* बेसन, हल्दी, चंदन और गुलाबजल से तैयार उबटन लगाएं।

* अपामार्ग की पत्तियों अथवा जड़ का धार्मिक परंपरा के अनुसार प्रयोग करें।

* इसके बाद स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

* भगवान का स्मरण करते हुए परिवार की सुख-समृद्धि और आरोग्य की कामना करें।

यह परंपरा बाहरी स्वच्छता के साथ मन के विकारों को दूर करने और स्वयं को नई ऊर्जा से भरने का प्रतीक मानी जाती है।

  -  नरक चतुर्दशी की पूजन सामग्री

इस दिन पूजा के लिए लकड़ी की चौकी, लाल या पीला वस्त्र, भगवान श्रीकृष्ण, माता काली, हनुमान जी, लक्ष्मी-गणेश और यमराज के चित्र अथवा प्रतिमा रखी जा सकती है।

इसके अतिरिक्त रोली, अक्षत, चंदन, कुमकुम, पुष्प, धूप, अगरबत्ती, कपूर, घी, सरसों का तेल, मिट्टी या आटे के दीपक, फल, खील-बताशे, मिठाई और खीर आदि की व्यवस्था करें।

  -  भगवान श्रीकृष्ण, माता काली और हनुमान जी की पूजा विधि

नरक चतुर्दशी के दिन प्रातः स्नान के बाद पूजा स्थल की सफाई करें। चौकी पर स्वच्छ वस्त्र बिछाकर देवी-देवताओं की प्रतिमाएं स्थापित करें। इसके बाद रोली, चंदन और अक्षत से तिलक करें। पुष्प अर्पित कर धूप-दीप जलाएं और फल-मिठाई का भोग लगाएं।

भगवान श्रीकृष्ण के समक्ष बैठकर उनके नरकासुर वध का स्मरण करें और निम्न मंत्र का जाप करें-

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

माता काली की आराधना कर शक्ति, साहस और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा की प्रार्थना करें। वहीं हनुमान जी को सिंदूर, पुष्प और प्रसाद अर्पित कर हनुमान चालीसा का पाठ करना शुभ माना जाता है।

धार्मिक मान्यता है कि माता काली की उपासना से भय और नकारात्मकता से मुक्ति मिलती है, जबकि हनुमान जी की आराधना से साहस, आत्मविश्वास और संकटों से लड़ने की शक्ति प्राप्त होती है।

  -  यम दीपदान: अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति की कामना

नरक चतुर्दशी पर यम दीपदान का विशेष धार्मिक महत्व है। मान्यता है कि इस दिन दक्षिण दिशा में दीपक जलाकर यमराज से परिवार के सदस्यों की दीर्घायु और अकाल मृत्यु से रक्षा की प्रार्थना की जाती है।

इसके लिए मिट्टी अथवा आटे का चौमुखी दीपक लें। उसमें सरसों का तेल भरकर चार बत्तियां लगाएं। परंपरा के अनुसार सिक्का और कौड़ी भी रखी जा सकती है। संध्याकाल में दीपक प्रज्वलित कर घर के बाहर दक्षिण दिशा की ओर रखें। दीपक किसी सुरक्षित स्थान पर रखें, जहां हवा या आवागमन से उसके बुझने अथवा दुर्घटना होने का खतरा न हो।

  - दीपदान करते समय यह मंत्र पढ़ा जाता है—

मृत्युना पाशहस्तेन कालेन भार्यया सह। त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यज: प्रीतयामिति॥

इस मंत्र के माध्यम से यमराज से परिवार की सुरक्षा, आरोग्य और दीर्घायु की कामना की जाती है। घर के मुख्य द्वार, आंगन और अन्य स्थानों पर भी दीप प्रज्वलित किए जाते हैं, जिससे पूरा वातावरण प्रकाशमय हो उठता है।

  - नरक चतुर्दशी पर दीप प्रज्ज्वलन का महत्व

इस पर्व पर घर के प्रत्येक कोने में दीप जलाने की परंपरा है। मिट्टी के दीपकों से सजा घर केवल सुंदरता का प्रतीक नहीं होता, बल्कि यह जीवन में ज्ञान, आशा और सकारात्मकता के आगमन का संदेश देता है। मान्यता है कि दीपदान से घर में सुख-शांति और समृद्धि का वातावरण बनता है।

छोटी दिवाली पर बाजारों में दीपक, मोमबत्तियां, सजावटी सामान और मिठाइयों की रौनक दिखाई देने लगती है। घरों की साफ-सफाई और सजावट के साथ परिवार के लोग मिलकर दीपोत्सव की तैयारियों में जुट जाते हैं।

 - नरक चतुर्दशी का आध्यात्मिक और सामाजिक संदेश

नरक चतुर्दशी हमें यह सिखाती है कि मनुष्य के भीतर मौजूद अहंकार, क्रोध, ईर्ष्या, लोभ और द्वेष ही वास्तविक अंधकार हैं। जब व्यक्ति अपने भीतर के इन विकारों को समाप्त कर सत्य, प्रेम, करुणा और सदाचार का मार्ग अपनाता है, तभी जीवन में वास्तविक प्रकाश का आगमन होता है।

भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर का अंत अन्याय पर न्याय की विजय का प्रतीक है। माता काली की उपासना शक्ति और निर्भयता का संदेश देती है, जबकि हनुमान जी की आराधना समर्पण, सेवा और साहस की प्रेरणा देती है। यम दीपदान जीवन की अनिश्चितता के बीच दीर्घायु और परिवार की मंगलकामना का प्रतीक है।

इस प्रकार नरक चतुर्दशी केवल धार्मिक कर्मकांड का पर्व नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, सद्भाव और सकारात्मक जीवन दृष्टि अपनाने का अवसर है। अभ्यंग स्नान, देवी-देवताओं की आराधना और दीपदान के माध्यम से यह पर्व मनुष्य को बाहरी ही नहीं, बल्कि आंतरिक स्वच्छता का भी संदेश देता है।

आइए, इस छोटी दिवाली पर केवल अपने घरों को ही नहीं, बल्कि अपने विचारों और व्यवहार को भी दीपों की रोशनी से प्रकाशित करें। यही नरक चतुर्दशी का वास्तविक संदेश और दीपोत्सव की सार्थकता है।

आप सभी को नरक चतुर्दशी एवं रूप चौदस की हार्दिक शुभकामनाएं।

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