अरे भई! पत्रकारिता भी गजब के दौर से गुजर रही है। एक तरफ बड़े-बड़े मीडिया संस्थानों के विज्ञापनों पर सरकारी खजाने की मेहरबानी बरसती है, दूसरी तरफ छोटे अखबार, न्यूज पोर्टल और सोशल मीडिया संस्थान विज्ञापन की एक बूंद के लिए तरसते नजर आते हैं। आखिर इन संस्थानों ने कौन-सा ऐसा गुनाह कर दिया कि सरकार की नजर में इनकी कोई औकात ही नहीं?
सेंटी गुरु कहते हैं कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ अब शायद मंजिल देखकर नहीं, बल्कि संस्थान का कद और पहुंच देखकर सम्मानित होता है। बड़े संस्थानों के लिए विज्ञापनों के दरवाजे खुले हैं और छोटे संस्थानों के हिस्से में आश्वासन की चाशनी, नेताओं की मिठाई और कभी-कभार पुरस्कार का लॉलीपॉप आ जाता है।

नेताओं का भी अपना निराला अंदाज है। पत्रकारों को सम्मानित करने के लिए मंच सजता है, शॉल ओढ़ाई जाती है, मिठाई के डिब्बे थमाए जाते हैं और कभी-कभी लिफाफा देकर फोटो भी खिंचवा ली जाती है। लेकिन जब बात मीडिया संस्थान को विज्ञापन देने की आती है तो बजट की फाइल ऐसी गुम होती है, जैसे सरकारी दफ्तर में जनता की शिकायत!
अब सवाल यह है कि पत्रकार को मिठाई खिलाने से उसके संस्थान का बिजली बिल भरेगा? सम्मान की शॉल से अखबार का कागज खरीदा जाएगा? नकद इनाम से वेब पोर्टल का सर्वर चलेगा? पत्रकारिता केवल सम्मान समारोह और फोटो सेशन के सहारे जिंदा नहीं रह सकती।
प्रिंट मीडिया हो या डिजिटल मीडिया, छोटे संस्थान भी जनता की आवाज उठाते हैं, गांव-कस्बों की समस्याएं सामने लाते हैं और प्रशासन को आईना दिखाते हैं। फिर विज्ञापन वितरण में इनके साथ सौतेला व्यवहार क्यों? क्या सरकारी विज्ञापन किसी की निजी जागीर हैं?
सेंटी गुरु की सरकार और सियासत से बस इतनी-सी गुजारिश है कि पत्रकारों को मिठाई और संस्थानों को झुनझुना थमाने की परंपरा बंद कीजिए। विज्ञापन दीजिए तो पारदर्शी नीति और समान अवसर के आधार पर दीजिए।
वरना याद रखिए, लोकतंत्र का चौथा स्तंभ केवल बड़े-बड़े भवनों में नहीं बसता, उसकी असली आवाज छोटे शहरों और कस्बों के छोटे संस्थानों से भी निकलती है।
सेंटी गुरु ने आखिरी चुटकी लेते हुए कहा - पत्रकार को सम्मान की मिठाई नहीं, उसके संस्थान को काम का विज्ञापन चाहिए। क्योंकि तालियों से अखबार नहीं छपते और झुनझुने से डिजिटल मीडिया नहीं चलता!










टिप्पणियाँ
इस खबर पर सबसे पहले अपनी टिप्पणी करें।