8 नवंबर, 2026  |  22:35 IST
विज्ञापन
Billboard 1275x450
Billboard 1275x450
Billboard 1275x450
Billboard 1275x450
Billboard 1275x450
Billboard 1275x450

अयोध्या में अखिलेश की आस्था या 2027 की चुनावी रणनीति?

अजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार... ✍️

⏱ 1 मिनट में पढ़ें👁 19 बार पढ़ा गया
अयोध्या में अखिलेश की आस्था या 2027 की चुनावी रणनीति?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में अयोध्या एक बार फिर सियासी विमर्श के केंद्र में है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव 12 दिसंबर 2026 को परिवार सहित रामलला के दर्शन और हनुमानगढ़ी में माथा टेकने पहुंचेंगे। इस प्रस्तावित यात्रा ने प्रदेश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। सवाल है कि यह आस्था का सहज प्रकटीकरण है या 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा के हिंदुत्व के राजनीतिक विमर्श को चुनौती देने की रणनीति?

अखिलेश की इस यात्रा को 1990 की अयोध्या गोलीबारी की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से अलग करके नहीं देखा जा सकता। उस समय उनके पिता मुलायम सिंह यादव प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। कारसेवकों पर पुलिस कार्रवाई आज भी भाजपा के लिए सपा को घेरने का बड़ा राजनीतिक मुद्दा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और भाजपा नेता भी अखिलेश को इसी इतिहास की याद दिलाते रहे हैं। सहयोगी ओमप्रकाश राजभर ने भी उनके मंदिर दर्शन को लेकर तंज कसा है। जाहिर है, भाजपा इस यात्रा को सपा की पुरानी राजनीतिक छवि से जोड़कर चुनावी बहस को धार्मिक पहचान की ओर मोड़ना चाहेगी।

विज्ञापन
WhatsApp

दूसरी ओर, अखिलेश के सामने अपनी राजनीतिक विरासत को नए स्वरूप में प्रस्तुत करने की चुनौती है। समाजवादी पार्टी का पारंपरिक मुस्लिम-यादव समीकरण अब पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक राजनीति के विस्तार से जुड़ा है। रामलला के दर्शन के जरिए अखिलेश यह संदेश देना चाहेंगे कि उनकी राजनीति किसी धर्म के विरोध पर आधारित नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और सर्वधर्म सम्मान की पक्षधर है।

2024 के लोकसभा चुनाव में फैजाबाद सीट पर सपा की जीत ने भाजपा के राजनीतिक दावों को चुनौती दी थी। इससे यह भी स्पष्ट हुआ कि मतदाता केवल धार्मिक प्रतीकों से प्रभावित नहीं होता, बल्कि रोजगार, महंगाई, विकास और सामाजिक प्रतिनिधित्व भी उसके निर्णय को प्रभावित करते हैं।

अयोध्या के विकास, स्थानीय व्यापारियों की स्थिति, युवाओं के रोजगार और विस्थापित परिवारों के पुनर्वास जैसे मुद्दे भी चुनावी बहस का हिस्सा बनने चाहिए।

अखिलेश की अयोध्या यात्रा निश्चित रूप से प्रतीकात्मक महत्व रखती है, लेकिन मंदिर में शीश झुकाने मात्र से राजनीतिक सवाल समाप्त नहीं होंगे। भाजपा को भी अपने विकास और शासन का हिसाब देना होगा।

आखिर 2027 का चुनाव केवल आस्था बनाम राजनीति का मुकाबला नहीं होगा। असली कसौटी यह होगी कि कौन जनता के वर्तमान सवालों का बेहतर जवाब देता है। रामलला के दरबार में शीश झुकाना आस्था है, लेकिन जनता की अदालत में जवाब देना राजनीति की असली परीक्षा है।

यह खबर शेयर करें
jilanazar.com
jilanazar.com · सम्पादकीय डेस्क jilanazar.com की और खबरें →

यह भी पढ़ें

टिप्पणियाँ

इस खबर पर सबसे पहले अपनी टिप्पणी करें।