8 नवंबर, 2026  |  22:34 IST
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स्वदेशी की चमक में गुम हो गया कारीगर का पसीना

विकास भारद्वाज... ✍️

⏱ 1 मिनट में पढ़ें👁 8 बार पढ़ा गया
स्वदेशी की चमक में गुम हो गया कारीगर का पसीना

दीपावली आते ही स्वदेशी का स्वर बुलंद होने लगता है। स्थानीय उत्पाद खरीदने और आत्मनिर्भर भारत का संकल्प दोहराने की अपीलें गूंजने लगती हैं।

 

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 मुरादाबाद का पीतल, भदोही का कालीन, फिरोजाबाद का कांच, कन्नौज का इत्र, वाराणसी का रेशम और लखनऊ की चिकनकारी प्रदेश की पहचान हैं। लेकिन इन चमकदार उत्पादों के पीछे छिपे कारीगरों के पसीने और संघर्ष की सुध कौन लेता है? जब मेहनत का उचित मूल्य न मिले और नई पीढ़ी पुश्तैनी हुनर छोड़ने लगे, तो स्वदेशी का उत्सव किसके लिए है?

उत्तर प्रदेश सरकार की एक जिला, एक उत्पाद (ओडीओपी) योजना 24 जनवरी 2018 को स्थानीय हुनर को वैश्विक पहचान दिलाने के उद्देश्य से शुरू हुई। प्रदेश के 75 जिलों के 110 उत्पाद इसमें शामिल किए गए। प्रशिक्षण, औजार वितरण, सब्सिडी और रोजगार सृजन के सरकारी आंकड़े योजना के विस्तार की कहानी कहते हैं। मगर परियोजना स्वीकृत होना और रोजगार का स्थायी होना अलग-अलग बातें हैं। असली सवाल यह है कि इन योजनाओं से कारीगर की आमदनी कितनी बढ़ी?

प्रदेश का निर्यात लगातार बढ़ा है और ओडीओपी उत्पादों ने भी बाजार में पहचान बनाई है। लेकिन बढ़ते निर्यात का अर्थ यह नहीं कि उसका लाभ सीधे कारीगर तक पहुंच रहा है। कारोबार में वृद्धि और मेहनतकश की आर्थिक खुशहाली के बीच अभी लंबी दूरी है। क्या कारीगर को उचित मजदूरी, समय पर भुगतान और अपने उत्पाद का सही मूल्य मिल रहा है?

ई-कॉमर्स और डाकघर के माध्यम से निर्यात की पहल सराहनीय है, लेकिन वेबसाइट पर उत्पाद प्रदर्शित कर देना पर्याप्त नहीं। गुणवत्ता, पैकेजिंग, तकनीकी प्रशिक्षण और ग्राहकों तक पहुंच की व्यवस्था भी जरूरी है। इसी तरह कुम्हारों को बिजली चालित चाक देने से ही उनकी आजीविका सुरक्षित नहीं होगी। उन्हें मिट्टी, भट्ठी, सस्ती बिजली और सालभर बाजार भी चाहिए।

कारीगरों की राह में महंगा कच्चा माल, बैंक ऋण की कठिन शर्तें, बिचौलियों का दबदबा और भुगतान में देरी बड़ी बाधाएं हैं। सरकार को सस्ता ऋण, बीमा, साझा मशीन केंद्र और सुनिश्चित बाजार उपलब्ध कराने चाहिए। साथ ही योजनाओं की पारदर्शिता के लिए सक्रिय इकाइयों, स्थायी रोजगार और कारीगरों की औसत आमदनी का सार्वजनिक हिसाब होना चाहिए।

स्वदेशी का अर्थ केवल विदेशी उत्पादों का विकल्प खड़ा करना नहीं, बल्कि अपने हुनरमंद नागरिकों को सम्मानजनक आजीविका देना है। आखिर कैसी आत्मनिर्भरता, जिसमें उत्पाद अपना हो, हुनर अपना हो, मेहनत अपने लोगों की हो, मगर मुनाफे का बड़ा हिस्सा किसी और की जेब में चला जाए?

स्वदेशी की असली चमक विज्ञापनों और नारों में नहीं, बल्कि कारीगर के घर में जलते चूल्हे और उसके चेहरे की मुस्कान में दिखाई देनी चाहिए।

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