उत्तर प्रदेश की राजनीति में दीपावली की मिठाई इस बार सिर्फ त्योहार की मिठास तक सीमित नहीं दिख रही, बल्कि इसके पीछे सियासी संदेश भी तलाशे जा रहे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ओर से पहली बार प्रदेशभर के बीजेपी मंडल अध्यक्षों तक दीपावली की मिठाई पहुंचाने की खबरें चर्चा में हैं। इससे पहले यह परंपरा मुख्य रूप से गोरखपुर तक सीमित बताई जाती रही है। सिद्धार्थनगर, महाराजगंज से लेकर जालौन तक सामने आ रही तस्वीरें पार्टी संगठन और सरकार के रिश्तों पर नए सवाल खड़े कर रही हैं।
सवाल यह है कि आखिर इस पहल की जरूरत अभी क्यों महसूस हुई? क्या यह महज त्योहार पर कार्यकर्ताओं के प्रति अपनापन जताने का प्रयास है या फिर संगठन के भीतर पनप रही नाराजगी को कम करने की कोशिश?

पिछले साढ़े नौ वर्षों के शासनकाल में बीजेपी के जमीनी कार्यकर्ताओं के एक वर्ग की यह शिकायत लगातार सामने आती रही है कि पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्था में उनकी सुनवाई पहले जैसी नहीं रही। सत्ता का हिस्सा होने के बावजूद कई कार्यकर्ता खुद को उपेक्षित महसूस करते रहे हैं। यदि यह असंतोष व्यापक है तो आगामी चुनावों में पार्टी के लिए चुनौती बन सकता है।
विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) जैसे अभियान में कार्यकर्ताओं की सक्रियता को लेकर उठ रहे सवाल भी संगठनात्मक स्थिति पर चर्चा को हवा दे रहे हैं। हालांकि, इसे सीधे तौर पर किसी संगठित बगावत का प्रमाण मानना जल्दबाजी होगी। इसी तरह मिठाई वितरण को मुख्यमंत्री की चुनावी घबराहट या किसी राजनीतिक सरेंडर का निश्चित संकेत कहना भी उचित नहीं होगा।
लेकिन राजनीति में समय और संदेश दोनों का महत्व होता है। चुनाव से पहले कार्यकर्ताओं को साधने की कोशिश बताती है कि संगठन की जमीनी मजबूती कितनी जरूरी है। आखिर चुनाव केवल बड़े नेताओं के भाषणों से नहीं, बल्कि बूथ पर खड़े कार्यकर्ताओं की मेहनत से जीते जाते हैं।
सवाल मिठाई का नहीं, भरोसे का है। मिठाई कुछ दिनों की मिठास दे सकती है, लेकिन वर्षों की नाराजगी दूर करने के लिए सम्मान, संवाद और कार्यकर्ताओं की समस्याओं का वास्तविक समाधान जरूरी है। वरना सियासत में मिठाई के डिब्बे तो बंट जाएंगे, लेकिन दिलों की कड़वाहट बनी रह सकती है।
सन्त कुमार भारद्वाज










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