राहुल गांधी ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर को अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो का कर्मचारी बताकर निशाना साधा है. इस बयान के बाद 2013 की एक कूटनीतिक घटना चर्चा में है. तब तत्कालीन विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री राजा परवेज अशरफ की मेजबानी की थी. सवाल है कि क्या विदेशी नेताओं से मुलाकात या कूटनीतिक प्रोटोकॉल के आधार पर किसी मंत्री की निष्ठा पर सवाल उठाना उचित है?
दिल्ली की कूटनीति के गलियारों में अचानक तब बड़ा भूचाल आ गया, जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सीधे विदेश मंत्री एस. जयशंकर को निशाने पर ले लिया. अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो से होने वाली बैठक की खबर सामने आते ही राहुल गांधी ने जयशंकर को रुबियो का कर्मचारी बता दिया. इस तीखे राजनीतिक हमले ने पूरे देश का ध्यान खींच लिया है, लेकिन इस बयान के बाद पुराना इतिहास भी खंगाला जाने लगा है. इस विवाद के बीच 2013 का वो दौर चर्चा में आ गया है, जब यूपीए सरकार के दौरान विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने जयपुर में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के लिए लंच आयोजित किया था. अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या कूटनीतिक बैठकों और प्रोटोकॉल के आधार पर देश के विदेश मंत्री को किसी दूसरे देश का कर्मचारी कहना उचित है, या
फिर यह सिर्फ एक राजनीतिक पैंतरा है?
राहुल गांधी ने X पर तंज कसते हुए लिखा कि रुबियो ने अपने ‘कर्मचारी’ को मुंबई बुलाया है. लेकिन रुकिए, ज़रा फ्लैशबैक में चलते हैं—क्या सच में विदेशी नेताओं से मुलाकात या किसी अनाउंसमेंट के आधार पर किसी विदेश मंत्री को ‘कर्मचारी’ बोलना सही है? अगर हाँ, तो फिर 2013 के सलमान खुर्शीद वाले सीन का क्या? आइए इसका पूरा विश्लेषण करते हैं.
2013 का वो फ्लैशबैक: क्या तब सलमान खुर्शीद पाकिस्तान के कर्मचारी थे?
बात 9 मार्च 2013 की है. तब यूपीए (UPA) की सरकार थी और सलमान खुर्शीद भारत के विदेश मंत्री थे. पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजा परवेज अशरफ भारत यात्रा पर आए थे. सलमान खुर्शीद ने जयपुर के आलीशान ‘रामबाग पैलेस’ होटल में उनके लिए एक प्राइवेट वर्किंग लंच (लंच होस्ट) रखा था. अब अगर आज के लॉजिक से सोचें, तो क्या किसी पाकिस्तानी पीएम को लंच पर बुलाने या उनके साथ प्रोटोकॉल शेयर करने से सलमान खुर्शीद पाकिस्तान के ‘कर्मचारी’ बन गए थे? बिल्कुल नहीं! वो भारत के कूटनीतिक शिष्टाचार का हिस्सा था. तो फिर आज विदेश मंत्री एस. जयशंकर पर यह टैग क्यों?
रुबियो के कर्मचारी वाले बयान का रियलिटी चेक
राहुल गांधी और कांग्रेस नेता जयराम रमेश का मेन ऑब्जेक्शन यह था कि दो विदेश मंत्रियों की मीटिंग की जानकारी भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) के बजाय एक विदेशी अधिकारी ने क्यों दी. लेकिन फैक्ट्स और कूटनीति की वाइब समझें तो ग्लोबल स्टेज पर जब दो बड़े देशों के विदेश मंत्री मिलते हैं, तो उसकी जानकारी कोई भी साइड या डिप्लोमैट शेयर कर सकता है. इसे सीधा ‘कर्मचारी’ या ‘गुलामी’ से जोड़ना कूटनीतिक समझ की कमी या सिर्फ प्योर पॉलिटिकल ड्रामा लगता है.
डिप्लोमेसी का बेसिक रूल: प्रोटोकॉल vs नैरेटिव
डिप्लोमेसी का सिंपल रूल है, बातचीत के दरवाजे कभी बंद नहीं होते.
• प्रोफेशनल प्रोटोकॉल: विदेश मंत्री का काम ही दूसरे देशों के नेताओं, विदेश मंत्रियों और प्रतिनिधियों से मिलना है.
• पॉलिटिकल नैरेटिव: जब आप डिप्लोमेसी को घरेलू राजनीति में घसीटते हैं, तो नैरेटिव भले ही कैची लगे, पर अंतर्राष्ट्रीय मंच पर देश की छवि पर असर पड़ता है.
राजनीति में बयानबाजी और तंज चलते रहते हैं, पर इंटरनेशनल रिलेशंस को घरेलू ‘तू-तू मैं-मैं’ के चश्मे से देखना थोड़ा रिस्की हो जाता है. अगर किसी अमेरिकी अधिकारी के बयान से जयशंकर ‘कर्मचारी’ बन जाते हैं, तो फिर 2013 में पाकिस्तानी पीएम को लंच कराने वाले सलमान खुर्शीद पर भी वही लॉजिक लागू होगा. फैक्ट्स यही कहते हैं कि कूटनीति को कूटनीति की तरह देखा जाना चाहिए, न कि पॉलिटिकल माइलेज का जरिया बनाकर.
जयशंकर को अमेरिकी विदेश मंत्री रुबियो का कर्मचारी बताकर फिर 'पप्पू' साबित हुए राहुल गांधी
राहुल गांधी ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर को अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो का कर्मचारी बताकर निशाना साधा है. इस बयान के बाद 2013 की एक कूटनीतिक घटना चर्चा में है. तब तत्कालीन विदेश मंत्री सलमान खुर…
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