17 अक्टूबर, 2026  |  00:58 IST
Jila Nazar
शनिवार, 17 अक्टूबर 2026
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आंदोलनों की बहार, पत्रकारों की पुकार! अब कलम उठेगी या सिर्फ खबर बनेगी?

सेंटी गुरु का तंजनामा

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आंदोलनों की बहार, पत्रकारों की पुकार! अब कलम उठेगी या सिर्फ खबर बनेगी?

अरे ओ भइया! जरा कान खोलकर सुनो और आंखें मलकर देखो! जमाना बड़ा दिलचस्प दौर से गुजर रहा है। कहीं सीजेपी का आंदोलन, कहीं जैन जैड की आवाज और कहीं कांग्रेस का विरोध प्रदर्शन! सड़कों पर सवाल हैं, नारों की गूंज है, ज्ञापनों की बरसात है और लोकतंत्र के दरवाजे पर दस्तक देने वालों की कतार है। मगर सेंटी गुरु के मन में एक सवाल कुलबुला रहा है जब हर वर्ग अपने हक के लिए मैदान में उतर रहा है, तो क्या पत्रकारों की कलम भी कभी आंदोलन का बिगुल फूंकेगी?

सेंटी गुरु ने चाय की चुस्की ली, गमछा कंधे पर जमाया और बोले “गुरु! पत्रकार दूसरों के आंदोलन की खबर बनाते-बनाते कहीं खुद खबर बनना तो नहीं भूल गए?”

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अब देखिए न! पत्रकार सुबह से शाम तक नेताओं के बयान ढूंढता है, अफसरों की प्रतिक्रिया लेता है, जनता की परेशानी कैमरे में कैद करता है और व्यवस्था की खामियां अखबार के पन्नों पर उकेरता है। कभी धूप में खड़ा, कभी बारिश में भीगा, कभी दुर्घटना स्थल पर दौड़ा, तो कभी आधी रात को खबर के पीछे भागा। लेकिन जब बात पत्रकार की अपनी समस्याओं की आती है, तो कई बार उसकी आवाज उसी माइक में कैद होकर रह जाती है, जिससे वह दूसरों की आवाज बुलंद करता है।

सेंटी गुरु फिर मुस्कराए “भइया, लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है पत्रकारिता, लेकिन इस स्तंभ को सहारा देने वाले पत्रकारों की मजबूती पर भी तो चर्चा होनी चाहिए!”

कम वेतन, असुरक्षित नौकरी, विज्ञापन और भुगतान की समस्याएं, फील्ड में सुरक्षा का संकट तथा निष्पक्ष पत्रकारिता पर बढ़ते दबाव जैसे मुद्दों पर सवाल उठना जरूरी है। आखिर पत्रकार भी परिवार पालता है, बच्चों को पढ़ाता है और अपने भविष्य के सपने देखता है। क्या उसकी समस्याओं पर आवाज उठाना कोई गुनाह है?

लेकिन ठहरिए! सेंटी गुरु आंदोलन के अंधसमर्थक नहीं हैं। उनका कहना है कि पत्रकारों की आवाज तथ्यों, एकजुटता और नैतिकता के आधार पर उठनी चाहिए। आंदोलन किसी दल का झंडा उठाने के लिए नहीं, बल्कि पत्रकारिता की गरिमा, स्वतंत्रता और पत्रकारों के अधिकारों की रक्षा के लिए होना चाहिए।

अब सवाल वही है सीजेपी, जैन जैड और कांग्रेस के आंदोलनों के बाद क्या पत्रकार भी अपनी समस्याओं को लेकर संगठित होंगे? या फिर दूसरों के आंदोलन की हेडलाइन लिखकर अगली खबर की तलाश में निकल जाएंगे?

“भइया! दूसरों की आवाज बनने वालों की अपनी आवाज भी होनी चाहिए। आखिर कलम अगर सबका दर्द लिख सकती है, तो अपना दर्द कहने से परहेज कैसा? बस ध्यान रहे, आंदोलन खबर बनाने के लिए नहीं, हालात बदलने के लिए होना चाहिए!”

 सेंटी गुरु

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