12 अक्टूबर, 2026  |  23:44 IST
Jila Nazar
सोमवार, 12 अक्टूबर 2026
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ओबीसी आरक्षण पर भाजपा-कांग्रेस आमने-सामने, संवैधानिक कसौटी पर सामाजिक न्याय की चुनौती

- विकास भारद्वाज

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ओबीसी आरक्षण पर भाजपा-कांग्रेस आमने-सामने, संवैधानिक कसौटी पर सामाजिक न्याय की चुनौती

मध्यप्रदेश में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण का विवाद अब केवल कानूनी लड़ाई नहीं, बल्कि भाजपा और कांग्रेस की राजनीतिक जवाबदेही का भी सवाल बन गया है। दोनों दल अन्य पिछड़ा वर्ग के अधिकारों की रक्षा का दावा कर रहे हैं, लेकिन असली चुनौती इन दावों को संवैधानिक कसौटी पर खरा साबित करने की है। सवाल यह है कि सामाजिक न्याय की मंशा और कानूनी मजबूती के बीच संतुलन कैसे स्थापित होगा?

वर्ष 2019 में तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलनाथ के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने ओबीसी आरक्षण 14 से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने का फैसला किया था। इस व्यवस्था को अदालत में चुनौती दी गई। करीब सात साल चले विवाद के बाद हाईकोर्ट ने संबंधित अध्यादेश और संशोधन कानून को असंवैधानिक ठहराते हुए निरस्त कर दिया। अदालत ने लोक सेवाओं और उच्च शिक्षा में ओबीसी आरक्षण 14 प्रतिशत रखने तथा रोके गए 13 प्रतिशत पदों पर अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को तीन महीने के भीतर नियुक्ति देने के निर्देश दिए। पहले से हो चुकी नियुक्तियों को वैध माना गया है।

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अदालत ने आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा और सुप्रीम कोर्ट के स्थापित सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि इससे आगे जाने के लिए असाधारण परिस्थितियों का पर्याप्त संवैधानिक आधार जरूरी है। इस प्रकार विवाद पिछड़े वर्ग को आरक्षण देने की आवश्यकता से अधिक, उसे 27 प्रतिशत तक बढ़ाने के कानूनी आधार पर केंद्रित रहा।

कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने फैसले के लिए भाजपा सरकार की कमजोर पैरवी को जिम्मेदार ठहराया है। कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दाखिल करने, अनुभवी वकीलों की टीम नियुक्त करने और विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने की मांग की है। पार्टी जातिगत जनगणना के जरिए पिछड़ेपन के प्रमाणिक आंकड़े जुटाने पर भी जोर दे रही है।

दूसरी ओर, भाजपा का तर्क है कि कांग्रेस ने राजनीतिक लाभ की जल्दबाजी में पर्याप्त संवैधानिक तैयारी के बिना आरक्षण बढ़ाने का फैसला किया। हाईकोर्ट की टिप्पणी को भाजपा इसी दलील के समर्थन में रख रही है।

इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू युवाओं का भविष्य है। ओबीसी वर्ग को पर्याप्त प्रतिनिधित्व और अवसर मिलना सामाजिक न्याय की आवश्यकता है, वहीं लंबित भर्तियों और अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों के हितों का समाधान भी जरूरी है।

अंततः भाजपा और कांग्रेस, दोनों की जिम्मेदारी है कि राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर ऐसा कानूनी समाधान तलाशें, जो संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप हो। आरक्षण की वास्तविक सफलता केवल घोषणा में नहीं, बल्कि अधिकारों की टिकाऊ सुरक्षा और न्यायपूर्ण अवसरों में निहित है।

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jilanazar.com · सम्पादकीय डेस्क jilanazar.com की और खबरें →

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