26 अक्टूबर, 2026  |  01:54 IST
Jila Nazar
सोमवार, 26 अक्टूबर 2026
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शरद पूर्णिमा: चाँदनी में भक्ति, प्रेम और मानवता का संदेश

शरद पूर्णिमा की उजली रात केवल चंद्रमा की शीतल चाँदनी का उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिक आस्था, प्रेम और मानवता के गहरे संबंधों का प्रतीक है।

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शरद पूर्णिमा: चाँदनी में भक्ति, प्रेम और मानवता का संदेश

शरद पूर्णिमा की उजली रात केवल चंद्रमा की शीतल चाँदनी का उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिक आस्था, प्रेम और मानवता के गहरे संबंधों का प्रतीक है। जब आकाश में चंद्रमा अपनी पूर्ण आभा के साथ चमकता है और प्रकृति शीतलता की चादर ओढ़ लेती है, तब वातावरण में एक अनूठी दिव्यता का अनुभव होता है। मंदिरों की घंटियाँ, भजन-कीर्तन और श्रद्धालुओं की प्रार्थनाएँ इस रात को आस्था के विशेष रंगों से भर देती हैं।

शरद पूर्णिमा का उल्लेख आते ही भगवान श्रीकृष्ण की रासलीला और वृंदावन की कुंज गलियों का स्मरण सहज ही हो उठता है। राधा-कृष्ण का प्रेम भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में समर्पण, निष्ठा और आत्मिक अनुराग का प्रतीक माना जाता है। रासलीला का भाव यह संदेश देता है कि जब मन अहंकार से मुक्त होकर प्रेम और भक्ति में लीन होता है, तब जीवन में आत्मिक आनंद का संचार होता है। मुरली की मधुर तान मानो मनुष्य को सांसारिक उलझनों से ऊपर उठकर अपने भीतर झाँकने का निमंत्रण देती है।

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शरद पूर्णिमा पर माँ लक्ष्मी की पूजा-अर्चना, दीप प्रज्ज्वलन और खीर बनाने की परंपरा भी विशेष महत्त्व रखती है। मान्यता है कि इस रात्रि में चंद्रमा की किरणों से अमृत बरसता है। इसी आस्था के चलते अनेक परिवार खीर बनाकर चाँदनी में रखते हैं और प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। धार्मिक मान्यताओं से परे यह परंपरा परिवार को एक साथ बैठने, प्रसन्नता बाँटने और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ने का अवसर देती है।

आज के समय में शरद पूर्णिमा का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। पूजा-पाठ, व्रत और दीपदान तभी सार्थक हैं, जब उनके साथ हमारे व्यवहार में प्रेम, दया, सत्य और संवेदनशीलता भी दिखाई दे। समाज में ऐसे अनेक लोग हैं, जिनके जीवन में अभावों का अंधकार है। यदि त्योहार की खुशियों में जरूरतमंदों को शामिल किया जाए, भूखे को भोजन मिले और निराश व्यक्ति को सहारा मिले, तो यही पर्व की वास्तविक सार्थकता होगी।

शरद पूर्णिमा हमें सिखाती है कि बाहरी उजाला तभी अर्थपूर्ण है, जब भीतर भी विवेक और करुणा का प्रकाश हो। आइए, इस पावन अवसर पर संकल्प लें कि हमारी आस्था केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित न रहे, बल्कि हमारे कर्मों में भी दिखाई दे। प्रेम को पूजा, सेवा को साधना और मानवता को सबसे बड़ा धर्म बनाकर ही हम इस दिव्य रात्रि के संदेश को अपने जीवन में उतार सकते हैं।

 

• सन्त कुमार भारद्वाज

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