उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के बीच सियासी दलों ने अपनी रणनीति तेज कर दी है। अखिलेश यादव द्वारा भाजपा और बसपा के नेताओं को समाजवादी पार्टी में शामिल करना विपक्ष के सामाजिक आधार के विस्तार की कोशिश है। शाक्य, मौर्य, प्रजापति, पासी और अन्य वर्गों के नेताओं को जोड़कर सपा उस गैर-यादव पिछड़े और दलित वोट बैंक में पैठ बनाना चाहती है, जिसे भाजपा ने लंबे समय से अपने साथ जोड़े रखा है। लेकिन बड़ा सवाल है कि क्या नेताओं के पाला बदलने से मतदाताओं की पसंद भी बदल जाएगी?
2017 में भाजपा ने उत्तर प्रदेश में 312 विधानसभा सीटें जीती थीं, जबकि 2022 में उसकी सीटें घटकर 255 रह गईं। दूसरी ओर सपा 47 से बढ़कर 111 सीटों तक पहुंची। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने 37 सीटें जीतकर अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत की, जबकि भाजपा 33 सीटों पर सिमट गई। इन नतीजों ने प्रदेश की राजनीति में बदलते सामाजिक समीकरणों की चर्चा तेज की, लेकिन भाजपा का व्यापक मताधार भी बरकरार रहा। इसलिए किसी एक चुनाव के नतीजे को अगले चुनाव का निश्चित संकेत नहीं माना जा सकता।

बदायूं में सिनोद शाक्य और कुशाग्र सागर का सपा में शामिल होना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। कुशाग्र सागर 2017 में भाजपा के टिकट पर बिसौली से विधायक बने थे, लेकिन 2022 में सपा के आशुतोष मौर्य से 1,834 वोटों से हार गए। अब उनका सपा में आना राजनीतिक समीकरणों के साथ पार्टी के भीतर नई चुनौतियां भी पैदा कर सकता है। मौजूदा विधायक, पुराने कार्यकर्ता और नए दावेदारों के बीच तालमेल बनाए रखना नेतृत्व के लिए महत्वपूर्ण होगा।
दल-बदल की राजनीति का सबसे बड़ा भ्रम यह है कि किसी जाति का नेता पार्टी बदलता है तो पूरा समुदाय भी उसी के साथ चला जाता है। वास्तविकता इससे अलग है। जातीय पहचान चुनाव को प्रभावित जरूर करती है, लेकिन स्थानीय मुद्दे, प्रत्याशी की छवि, संगठन की सक्रियता और सरकार के कामकाज का आकलन भी मतदाताओं के निर्णय में भूमिका निभाते हैं। किसी नेता की व्यक्तिगत लोकप्रियता को पूरे समाज के समर्थन का प्रमाण मानना उचित नहीं है।
बदायूं में 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा और सपा ने तीन-तीन सीटें जीती थीं। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा की जीत ने पार्टी को नई ऊर्जा दी, लेकिन लोकसभा और विधानसभा चुनावों के मुद्दे तथा स्थानीय समीकरण अलग हो सकते हैं। अखिलेश यादव के सामने चुनौती नए नेताओं को जोड़ने के साथ पुराने कार्यकर्ताओं का भरोसा बनाए रखने की भी है। शिवपाल यादव सहित स्थानीय नेतृत्व की भूमिका इस संतुलन में महत्वपूर्ण होगी।
दूसरी ओर भाजपा के लिए भी गैर-यादव पिछड़े वर्गों और अन्य सामाजिक समूहों के नेताओं की नाराजगी को समझना जरूरी है। टिकट वितरण, संगठन में भागीदारी और स्थानीय कार्यकर्ताओं की शिकायतों का समाधान उसकी रणनीति के अहम पहलू होंगे। वहीं बसपा का 2022 में लगभग 12.9 प्रतिशत वोट हासिल करना बताता है कि उसके समर्थकों को पूरी तरह अप्रासंगिक मानना भी उचित नहीं होगा। हालांकि इन मतों का किसी दूसरे दल को स्वतः हस्तांतरण मान लेना गलत होगा।
आखिरकार, 2027 की राजनीतिक परीक्षा केवल इस बात की नहीं होगी कि किस दल ने कितने नेताओं को अपने पाले में किया। असली सवाल रोजगार, शिक्षा, महंगाई, सामाजिक न्याय और प्रशासनिक जवाबदेही पर जनता के भरोसे का है। नेताओं का दल बदलना राजनीतिक समीकरण बदल सकता है, लेकिन जनविश्वास हासिल करने के लिए ठोस काम, विश्वसनीय नेतृत्व और जनता से निरंतर संवाद जरूरी है। भाजपा हो या सपा, चुनावी सफलता का आकलन नेताओं की आवाजाही से नहीं, मतदाताओं के फैसले से ही होगा।





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