14 अक्टूबर, 2026  |  14:06 IST
Jila Nazar
बुधवार, 14 अक्टूबर 2026
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शक्ति की आराधना, आस्था की परंपरा और विजय का उत्सव हैं गरबा-डांडिया

मिट्टी के दीप से लेकर मां दुर्गा की तलवार तक, नवरात्रि के नौ दिनों में भक्ति, संस्कृति और असत्य पर सत्य की विजय का संदेश देते हैं ये पारंपरिक नृत्य

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शक्ति की आराधना, आस्था की परंपरा और विजय का उत्सव हैं गरबा-डांडिया

नवरात्रि का पर्व आते ही देशभर में मां दुर्गा की आराधना के साथ भक्ति, उल्लास और उत्साह का वातावरण छा जाता है। मंदिरों में पूजा-अर्चना, घरों में घटस्थापना और देवी गीतों के बीच गरबा तथा डांडिया की धूम विशेष आकर्षण का केंद्र बनती है। रंग-बिरंगे परिधानों में सजे महिला-पुरुष जब तालियों, ढोल और संगीत की लय पर गोल घेरे में नृत्य करते हैं, तो पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि गरबा और डांडिया केवल मनोरंजन अथवा सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि इनके पीछे देवी शक्ति की उपासना, धार्मिक प्रतीक और पौराणिक मान्यताओं की गहरी परंपरा भी जुड़ी हुई है?

इन नृत्यों में इस्तेमाल होने वाला मिट्टी का दीपयुक्त पात्र, जिसे गरबी या गरबा कहा जाता है, और डांडिया की छड़ियां देवी की शक्ति तथा विजय के प्रतीक माने जाते हैं। इनकी परंपरा नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा की आराधना और बुराई पर अच्छाई की विजय के संदेश को जीवंत करती है।

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गरबा: मिट्टी के पात्र में जीवन और शक्ति का प्रतीक

गरबा गुजरात की प्रमुख लोकनृत्य परंपराओं में से एक है, जिसकी लोकप्रियता आज देश-विदेश तक पहुंच चुकी है। इसकी धार्मिक परंपरा में मिट्टी के पात्र का विशेष महत्व है। नवरात्रि के दौरान कई स्थानों पर मिट्टी के मटके में दीपक प्रज्वलित किया जाता है। इस पात्र को गरबी या गरबा कहा जाता है। इसके भीतर जलता दीपक प्रकाश, जीवन, ऊर्जा और दिव्य शक्ति का प्रतीक माना जाता है।

परंपरागत रूप से मटके में छोटे छिद्र बनाए जाते हैं, जिनसे दीपक का प्रकाश बाहर दिखाई देता है। मिट्टी का पात्र पृथ्वी और सृजन का प्रतीक माना जाता है, जबकि उसके भीतर जलती ज्योति को जीवन की चेतना तथा देवी शक्ति से जोड़ा जाता है। इस प्रकार गरबा का स्वरूप केवल एक दीपपात्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह सृजन, ऊर्जा और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक बन जाता है।

गरबा नृत्य के दौरान श्रद्धालु इसी प्रतीक के चारों ओर गोल घेरा बनाकर नृत्य करते हैं। गोलाकार गति को जीवन के निरंतर प्रवाह, प्रकृति के चक्र और सृष्टि की निरंतरता से भी जोड़कर देखा जाता है। नृत्य की प्रत्येक ताल और कदम के साथ भक्त मां दुर्गा के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं।

डांडिया: मां दुर्गा की शक्ति और विजय का प्रतीक

डांडिया रास नवरात्रि का एक अन्य लोकप्रिय पारंपरिक नृत्य है। इसमें महिला-पुरुष सजी हुई लकड़ी की छड़ियों के साथ संगीत की लय पर नृत्य करते हैं। डांडिया की छड़ियों को धार्मिक मान्यताओं में मां दुर्गा की तलवार का प्रतीक माना जाता है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मां दुर्गा ने महिषासुर नामक असुर से युद्ध कर उसका अंत किया था। यह कथा अधर्म, अहंकार और अत्याचार पर धर्म, साहस तथा सत्य की विजय का संदेश देती है। डांडिया के दौरान छड़ियों का लयबद्ध तरीके से एक-दूसरे से टकराना इसी संघर्ष और शक्ति के प्रतीकात्मक रूप में देखा जाता है।

हालांकि डांडिया की उत्पत्ति और उसके स्वरूप को लेकर विभिन्न सांस्कृतिक परंपराएं भी प्रचलित हैं, लेकिन नवरात्रि के संदर्भ में इसे देवी की आराधना, सामूहिक उत्सव और विजय की भावना से जोड़कर देखा जाता है। यही कारण है कि डांडिया केवल नृत्य नहीं, बल्कि श्रद्धा और सांस्कृतिक पहचान का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।

नौ दिनों के युद्ध से जुड़ी धार्मिक मान्यता

नवरात्रि का संबंध मां दुर्गा और महिषासुर के बीच हुए युद्ध की पौराणिक कथा से भी जोड़ा जाता है। मान्यता है कि देवी ने महिषासुर के अत्याचारों से देवताओं और संसार की रक्षा के लिए उसका सामना किया। नौ दिनों तक चले संघर्ष के बाद दसवें दिन देवी ने महिषासुर का वध किया। इसी विजय की स्मृति में विजयादशमी का पर्व मनाया जाता है।

गरबा और डांडिया को इस कथा से जोड़ने वाली परंपराएं नवरात्रि के धार्मिक महत्व को और गहरा बनाती हैं। गरबा में दीपक के चारों ओर घूमना देवी शक्ति के प्रति समर्पण का प्रतीक माना जाता है, जबकि डांडिया में छड़ियों का प्रयोग देवी के पराक्रम और संघर्ष की याद दिलाता है।

यह ध्यान रखना जरूरी है कि इन नृत्यों का प्रत्येक कदम किसी ऐतिहासिक युद्ध का वास्तविक चित्रण नहीं है। इन्हें धार्मिक आस्था, लोकपरंपरा और प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति के रूप में समझना अधिक उचित है।

भक्ति के साथ सामाजिक एकता का संदेश

गरबा और डांडिया की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये लोगों को एक साथ जोड़ते हैं। नवरात्रि के दौरान आयोजित कार्यक्रमों में अलग-अलग आयु वर्ग, परिवारों और समुदायों के लोग एक ही मंच पर भाग लेते हैं। पारंपरिक वेशभूषा, लोकगीत, ढोल, ताली और सामूहिक नृत्य के माध्यम से क्षेत्रीय संस्कृति की झलक दिखाई देती है।

गरबा में गोल घेरे का स्वरूप सहभागिता और सामूहिकता का भाव पैदा करता है। इसमें हर व्यक्ति अपनी जगह बनाते हुए दूसरों के साथ तालमेल स्थापित करता है। डांडिया भी आपसी तालमेल, अनुशासन और लय का अभ्यास कराता है। इस प्रकार ये नृत्य धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक सौहार्द और सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने का माध्यम बनते हैं।

आज गरबा और डांडिया के आयोजन धार्मिक स्थलों से निकलकर सार्वजनिक मैदानों, सांस्कृतिक संस्थानों और बड़े उत्सवों तक पहुंच गए हैं। आधुनिक संगीत और आकर्षक सजावट ने इनके स्वरूप को विस्तार दिया है, लेकिन इनकी मूल भावना देवी शक्ति के प्रति श्रद्धा और सामूहिक उत्सव से जुड़ी हुई है।

परंपरा के साथ मर्यादा और सुरक्षा भी जरूरी

नवरात्रि के दौरान गरबा और डांडिया आयोजित करते समय धार्मिक भावनाओं, सांस्कृतिक परंपराओं और सामाजिक मर्यादा का ध्यान रखना भी आवश्यक है। आयोजन स्थलों पर पर्याप्त प्रकाश, सुरक्षित व्यवस्था, स्वच्छता और भीड़ नियंत्रण पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। डांडिया की छड़ियों का इस्तेमाल सावधानी से किया जाना चाहिए, ताकि किसी को चोट न पहुंचे।

इसके साथ ही पारंपरिक गीतों, लोकसंगीत और सांस्कृतिक प्रतीकों का सम्मान करते हुए नई पीढ़ी को इनके महत्व से परिचित कराना जरूरी है। जब उत्सव मनोरंजन के साथ अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ता है, तभी वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनता है।

आस्था, ऊर्जा और विजय का उत्सव

गरबा और डांडिया नवरात्रि की ऐसी परंपराएं हैं, जिनमें भक्ति, लोकसंस्कृति और जीवन के सकारात्मक मूल्यों का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। गरबा का दीपक प्रकाश और चेतना का संदेश देता है, जबकि डांडिया की छड़ियां साहस, शक्ति और विजय की भावना को प्रतीकात्मक रूप से प्रस्तुत करती हैं।

नवरात्रि का वास्तविक संदेश केवल नृत्य और उत्सव तक सीमित नहीं है। यह अपने भीतर मौजूद नकारात्मकता, अहंकार और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की प्रेरणा भी देता है। मां दुर्गा की आराधना के साथ गरबा और डांडिया हमें याद दिलाते हैं कि शक्ति का सम्मान, समाज में एकता और सत्य के मार्ग पर चलना ही इस पर्व की सबसे बड़ी सार्थकता है।

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