सेंटी गुरु ने सुबह-सुबह अखबार खोला तो खबर पढ़कर चश्मा उतार लिया, माथे पर हाथ रखा और बोले “हे भगवान! अब तो डकैती डालने के लिए भी बदमाशों को मुहूर्त निकलवाना पड़ेगा क्या? पेट्रोल पंप लूटने की योजना बनाई ही थी कि पुलिस ने पांच शातिरों को दबोच लिया! अरे भाई, डकैती हुई नहीं, कैश बॉक्स खुला नहीं, पेट्रोल की एक बूंद तक लुटी नहीं और बदमाश सीधे हवालात पहुंच गए। इसे कहते हैं अपराध का श्रीगणेश होने से पहले ही विसर्जन!”
सेंटी गुरु ने चाय की चुस्की ली और व्यंग्य का दूसरा तीर छोड़ा “लगता है बदमाशों ने बाकायदा बैठक बुलाई होगी। एजेंडा रहा होगा—कौन-सा पेट्रोल पंप, कितनी रकम, कौन गाड़ी चलाएगा और कौन माल संभालेगा! बस, मीटिंग की कार्यवाही लिखना भूल गए। वरना पुलिस को शायद मिनट्स ऑफ मीटिंग भी मिल जाते!”
अब जमाना बदल गया है जनाब! पहले चोर चोरी करता था, डकैत डकैती डालता था, फिर पुलिस जांच में जुटती थी। घटनास्थल की छानबीन होती, सुराग तलाशे जाते, डॉग स्क्वॉड बुलाया जाता और पीड़ित को उम्मीद बंधाई जाती कि साहब, अपराधी जल्द पकड़े जाएंगे। लेकिन अब पुलिस ने अपराधियों के प्रोजेक्ट का उद्घाटन होने से पहले ही शटर गिराना शुरू कर दिया है।
मगर सेंटी गुरु के मन में एक मासूम सवाल कुलबुला रहा है आखिर बदमाशों की इस गोपनीय योजना की भनक पुलिस को लगी कैसे? क्या किसी ने मुखबिरी की, क्या कोई राजदार पलट गया या फिर बदमाशों ने अपनी योजना का प्रचार इतना जोरदार कर दिया कि खबर पुलिस तक खुद दौड़कर पहुंच गई?
खैर, पुलिस की तत्परता काबिल-ए-तारीफ है। अगर समय रहते सूचना पर कार्रवाई हुई और संभावित वारदात टल गई, तो यह निश्चित ही राहत की बात है। लेकिन असली परीक्षा तब भी रहेगी, जब अपराधियों की योजनाएं नहीं, अपराध के नेटवर्क भी कानून के शिकंजे में आएंगे।
उधर पेट्रोल पंप संचालकों ने राहत की सांस ली होगी। पेट्रोल के दाम भले आसमान छू रहे हों, लेकिन फिलहाल उनकी तिजोरी पर डकैती का खतरा जमीन पर ही रह गया!
भाइयो, अपराध की दुनिया में अब हथियारों से ज्यादा जरूरी गोपनीयता हो गई है; मगर याद रखना, पुलिस की नजर से बचकर योजना बनाना और कानून से बचकर निकल जाना दोनों अलग-अलग विषय हैं। और हां, डकैती का प्लान चाहे कितना भी शातिर हो, अगर पुलिस पहले पहुंच गई तो समझो पूरी फिल्म इंटरवल से पहले ही फ्लॉप हो गई!
सेंटी गुरु




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